Internet Fundamental Right: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- इंटरनेट हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार, बच्चों पर पूरी रोक लगाना बेतुका

नई दिल्ली: इंटरनेट इस्तेमाल करने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और बच्चे भी, उम्र चाहे जो हो, इस अधिकार से बाहर नहीं हैं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. चंद्रन की पीठ ने साफ किया कि सुरक्षा के नाम पर बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाना सही रास्ता नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी पाबंदियां ऐसे उपाय हैं जिनका फायदा साबित नहीं हुआ, लेकिन जिनका जरूरत से ज्यादा सख्त होना साबित है।
यह आदेश 15 अक्टूबर 2026 का है, जिसे शनिवार, 17 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सार्वजनिक किया गया। 136 पन्नों का यह आदेश ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश’ मामले में आया है, जिसमें मुख्य मुद्दा सोशल मीडिया पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री (CSEAM) को पकड़ने और हटाने का है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए थे।
कोर्ट ने क्या कहा
पीठ ने आदेश में लिखा, “हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चों को भी, उनकी उम्र चाहे जो हो, यही अधिकार हासिल हैं। उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि एक तय उम्र से कम के बच्चों की अंतरात्मा बचाने लायक नहीं है या उनकी अभिव्यक्ति की आजादी कोई मायने नहीं रखती।” कोर्ट ने आगे कहा, “बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।”
अनुच्छेद 21 जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। कोर्ट ने याद दिलाया कि 2020 के अनुराधा भसीन मामले में इंटरनेट के जरिए अभिव्यक्ति और कारोबार की आजादी को संवैधानिक संरक्षण मिला था, लेकिन तब यह सवाल खुला छोड़ दिया गया था कि इंटरनेट तक पहुंच अपने आप में मौलिक अधिकार है या नहीं। 2025 के प्रज्ञा प्रसून मामले में डिजिटल पहुंच को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया था। अब पीठ ने कहा है कि यह सवाल तय हो चुका है।

निशाने पर बच्चे नहीं, नुकसानदेह कंटेंट हो
पीठ ने माना कि दुनिया भर में हाल के समय में एक तय उम्र से कम के बच्चों को इंटरनेट, खासकर सोशल मीडिया से दूर रखने का चलन बढ़ा है। कोर्ट ने कहा कि उसने इस पर गंभीरता से विचार किया और फिर सोच-समझकर इसका समर्थन न करने का फैसला किया। ऑस्ट्रेलिया दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक लागू कर चुका है, इसलिए यह टिप्पणी अहम मानी जा रही है।
कोर्ट के मुताबिक, बच्चों की सुरक्षा के लिए उठाया गया कोई भी कदम नुकसानदेह सामग्री और उसके जिम्मेदार लोगों पर केंद्रित होना चाहिए, बच्चों पर नहीं। आदेश में लिखा है कि ऐसी सामग्री बनाने, फैलाने, बेचने या खोजने वाला ही असली अपराधी है, और वह प्लेटफॉर्म भी जिम्मेदार है जो उसे पकड़कर हटा नहीं पाता। ऐसी नाकामियों की सजा बच्चों को इंटरनेट से दूर रखकर देना, पीड़ित को ही समस्या मान लेने जैसा होगा।
पीठ ने उम्र जांचने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि उम्र आधारित पाबंदी लागू करने के लिए हर यूजर की उम्र पता करनी पड़ती है और संवेदनशील डेटा लगातार जुटाना पड़ता है, जिससे दुरुपयोग और निगरानी का खतरा बढ़ता है। दूसरे देशों के अनुभव का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून के डर से बच्चे इंटरनेट चलाना बंद नहीं करते, बल्कि माता-पिता से छिपकर ऐसे प्लेटफॉर्म पर चले जाते हैं जो और भी असुरक्षित हैं। इतना ही नहीं, ऑनलाइन धमकी या बहकावे का शिकार हुए बच्चे डांट के डर से घर पर बताने से भी कतराने लगते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले कई बच्चों के लिए इंटरनेट ही पढ़ाई और जानकारी का अकेला जरिया है, और विशेष जरूरतों वाले बच्चों को अक्सर वहीं अपने जैसे साथी मिलते हैं।
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पूरी छूट भी नहीं: ‘चाइल्ड मोड’ और माता-पिता की निगरानी
फैसले का मतलब यह नहीं है कि बच्चों के लिए कोई रोक-टोक नहीं होगी। पीठ ने साफ लिखा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कुछ उम्र आधारित सुरक्षा उपाय जरूरी हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को ज्यादा अहमियत मिले और उनके अकाउंट के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’ हो। कोर्ट ने ये उपाय गिनाए:
- बच्चों के अकाउंट शुरू से ही प्राइवेट रहें
- अनजान वयस्कों के संपर्क और मैसेज पर रोक लगे
- बच्चों को दिखने वाले विज्ञापनों और कंटेंट की निगरानी हो
- किशोरावस्था से पहले की उम्र (प्री-टीन) के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति जांचने का उचित और संतुलित तरीका हो
इन उपायों का ब्योरा तय करने का काम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर छोड़ा है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार एडल्ट वेबसाइटों जैसी बच्चों के लिए स्वभाव से ही नुकसानदेह सामग्री या सेवाओं पर रोक लगा सकती है।
सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही तय
यह मामला सितंबर 2024 के उस चर्चित फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी तय की थी। अब पीठ ने कहा कि उस फैसले को दो साल से ज्यादा बीत गए, लेकिन हालात में कोई खास सुधार नहीं हुआ। याचिकाकर्ताओं ने ऐसी खबरें कोर्ट के सामने रखीं, जिनमें सोशल मीडिया पर पैसे लेकर रीडायरेक्ट लिंक के जरिए ऐसी सामग्री के प्रचार की बात सामने आई थी। इसके बाद कोर्ट ने प्लेटफॉर्म्स के लिए विस्तृत ढांचा तय किया। इसकी मुख्य बातें ये हैं:
- केंद्र सरकार ऐसी सामग्री की पहचान के लिए एक राष्ट्रीय हैश और URL डेटाबेस बनाएगी। यह गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के ‘सहयोग’ पोर्टल का हिस्सा या अलग डेटाबेस हो सकता है। हैश किसी फोटो या वीडियो की डिजिटल पहचान होती है, जिससे उसकी कॉपी अपने आप पकड़ी जा सकती है।
- डेटाबेस में कोई भी एंट्री तभी होगी, जब कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ अलग-अलग जांच में उसे ऐसी सामग्री मानें।
- डेटाबेस से मेल खाने वाली सामग्री को प्लेटफॉर्म तुरंत हटाएंगे। नई पकड़ी गई सामग्री हटाने के दो घंटे के भीतर इसकी सूचना पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को देनी होगी।
- ऐसी सामग्री की शिकायत का विकल्प हर पोस्ट या प्रोफाइल से दो कदम के भीतर मिलना चाहिए, और हर शिकायत की पावती 24 घंटे में देनी होगी।
- कंपनियों को हर महीने अनुपालन रिपोर्ट छापनी होगी, जिसकी स्वतंत्र ऑडिट होगी।
- केंद्र नियम तोड़ने वाले प्लेटफॉर्म्स पर भारी जुर्माने का ढांचा बनाने पर विचार करे। पेवॉल या सब्सक्रिप्शन के जरिए ऐसी सामग्री से हुई कमाई जब्त की जाए।

कोर्ट ने बच्चों में डिजिटल सुरक्षा की जागरूकता और यौन शिक्षा पर भी जोर दिया। पीठ ने लिखा कि बच्चे इंटरनेट को समझने से बहुत पहले उस पर आ जाते हैं। एक बच्चा फोन चलाना तब सीख लेता है, जब वह अभी दोस्त और दोस्त बनकर आए अजनबी में फर्क भी नहीं कर पाता। बच्चों का शोषण करने वाले इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं।
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अब आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून मंत्रालय के जरिए केंद्र सरकार को इन निर्देशों और सुझावों पर अमल का जिम्मा सौंपा है। सरकार को जरूरत के मुताबिक दिशानिर्देश, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनानी होगी और IT एक्ट व IT नियमों में बदलाव करने होंगे। अगली सुनवाई तक सरकार को हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि इस दिशा में कितना काम हुआ। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।
खबर लिखे जाने तक इस फैसले पर केंद्र सरकार या इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्रालय की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
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