AI Training: सिर पर कैमरा लगाकर काम कर रहे भारतीय, रोबोट को सिखा रहे हुनर

नई दिल्ली: बेंगलुरु का एक 22 साल का नाई अब ग्राहकों के बाल काटते समय सिर पर कैमरा बांधे रहता है। कैमरा सिर्फ उसके हाथ और उंगलियां रिकॉर्ड करता है, ग्राहकों के चेहरे धुंधले कर दिए जाते हैं। BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, यह वीडियो आखिर में AI की ट्रेनिंग में काम आता है, खासकर उस ‘फिजिकल AI’ में, जो असली दुनिया में रोबोट को चलाती है।
BBC ने लिखा है कि दुनिया भर में कई लाख कामगारों को अपने रोजमर्रा के काम रिकॉर्ड करने के पैसे मिलते हैं। भारत में भी यह चलन तेजी से बढ़ रहा है। नीचे की जानकारी BBC की इसी रिपोर्ट पर आधारित है और हमने इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है।
कैसे काम करता है यह कारोबार
रिपोर्ट के मुताबिक, कामगार का वीडियो पहले किसी स्थानीय कंपनी के पास जाता है, जिसके पास सैकड़ों लोग रिकॉर्डिंग कर रहे होते हैं। फिर यह फुटेज टेक कंपनियों और शोध संस्थानों को बेचा जाता है, जो इससे रोबोट को सिखाते हैं। बेंगलुरु के नाई का कहना है कि वह रोज पांच-छह घंटे कैमरा पहनता है और उसे यह काम ‘भविष्य जैसा’ लगता है।
रशदान टेक्नोलॉजीज के सह-संस्थापक और सीईओ शाहिल बेग ने BBC को बताया कि उनकी कंपनी आठ से दस घंटे की रिकॉर्डिंग के लिए 5 से 10 डॉलर देती है। उनके मुताबिक, कंपनी सिर्फ हाथ रिकॉर्ड करती है, चेहरे नहीं, और जहां कई कैमरों से शरीर या आसपास का हिस्सा दिखता है, वहां चेहरे धुंधले किए जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नाम या संपर्क जैसी पहचान वाली जानकारी आगे नहीं दी जाती।

रोबोट को असली दुनिया का डेटा क्यों चाहिए
ह्यूमिन लैब्स के संस्थापक मनीष अग्रवाल के मुताबिक, रोबोट को सिर्फ कंप्यूटर सिमुलेशन से नहीं सिखाया जा सकता। उन्होंने BBC से कहा कि इंसानी गतिविधियों का कोई इंटरनेट-आर्काइव मौजूद नहीं है, इसलिए यह डेटा असली माहौल में नए सिरे से जुटाना पड़ता है। उनकी कंपनी के पास लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में 96,000 डेटा कलेक्टर हैं।
शाहिल बेग के मुताबिक, अब ग्राहक कंपनियां सिर्फ हाथ नहीं, पूरे दृश्य की रिकॉर्डिंग के लिए चार से छह कैमरों वाली रिग मांग रही हैं। वे ऐसे डेटा के लिए ज्यादा पैसे देते हैं, क्योंकि कामगार को इतने कैमरे पहनने के लिए राजी करना कहीं ज्यादा मुश्किल है। BBC के मुताबिक, कंपनियों को उम्मीद है कि इस साल भारत में दर्जनों और कंपनियां इस कारोबार में उतरेंगी।
किन कामों की हो रही रिकॉर्डिंग
शाहिल बेग ने बताया कि ग्राहक औद्योगिक काम, खेती, घर के काम और मिट्टी के बर्तन, सिलाई-कढ़ाई या मोमबत्ती बनाने जैसे छोटे कारोबारों का डेटा मांगते हैं। रिपोर्ट में बेंगलुरु का एक दर्जी बताता है कि उसे इसी काम के बदले थोड़ा ज्यादा पैसा मिल जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश के गुंतकल की एक विज्ञान शिक्षिका घर के काम रिकॉर्ड करके घंटे के दो से तीन डॉलर कमा रही हैं।

कामगारों की नौकरी पर क्या असर
रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कामगार उन्हीं मशीनों को सिखा रहे हैं, जो आगे चलकर उनका काम संभाल सकती हैं। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), मुंबई के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड लेबर स्टडीज के वरिष्ठ प्रोफेसर बिनो पॉल के मुताबिक, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि कुछ कामगारों के लिए AI उपयोगी औजार हो सकता है, लेकिन रोबोट कुछ दूसरी नौकरियों को ऑटोमेट भी कर सकते हैं।
पॉल ने चेतावनी दी कि अगर मशीनें काम संभालने लगीं, तो कामगार के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं बचेगा। उनके शब्दों में, ‘जब तक कामगार समझेंगे कि वे किसमें भागीदार बने हैं, तब तक बात बहुत आगे निकल चुकी होगी।’ वे भी कई अन्य लोगों की तरह AI के नियमन की मांग करते हैं।
‘फुटेज सप्लायर’ बनकर न रह जाए भारत
मनीष अग्रवाल का कहना है कि भारत अभी इस कारोबार में ज्यादातर कच्चे माल, यानी रिकॉर्ड किए गए वीडियो का सप्लायर है, जो विदेशी लैब को भेजा जाता है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कंपनियों की होड़ बढ़ेगी, इस काम की कीमत घटती जाएगी। उनके मुताबिक, भारत को वीडियो की सफाई, ढांचा बनाने और जांच जैसी पूरी प्रक्रिया पर नियंत्रण की ओर बढ़ना होगा, तभी वह इस कारोबार में आगे रह पाएगा।
रिपोर्ट में कामगारों ने इस काम को कमाई का अतिरिक्त जरिया बताया है। BBC की रिपोर्ट में किसी कंपनी पर नियमों के उल्लंघन का आरोप नहीं है। रोजगार पर असर को लेकर चिंता जताने वाले विशेषज्ञ AI के नियमन की मांग कर रहे हैं। (मूल रिपोर्ट: BBC News, 23 अक्टूबर 2026)
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