Karnataka Quota Verdict: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 56% आरक्षण कानून रद्द किया; SC-ST कोटा बढ़ाने वाला 2022 का अधिनियम असंवैधानिक घोषित

बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोमवार, 12 अक्टूबर को उस राज्य कानून के दो अहम प्रावधान रद्द कर दिए, जिनके जरिए अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण बढ़ाकर कुल कोटा 56 प्रतिशत तक पहुंचा दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश विभु बखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा पार करना संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन है।
सरकार ने कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों तथा राज्य सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022 के तहत SC आरक्षण 15 से 17 प्रतिशत और ST आरक्षण 3 से 7 प्रतिशत कर दिया था। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का 32 प्रतिशत कोटा जस का तस रहा, फिर भी कुल आरक्षण 50 से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया। अधिनियम को 11 जनवरी 2023 को राज्यपाल की अनुमति मिली, 12 जनवरी को राजपत्र में प्रकाशित हुआ और 1 नवंबर 2022 से प्रभावी माना गया।
अदालत ने अधिनियम की धारा 3 को इस हद तक असंवैधानिक ठहराया कि वह कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से आगे ले जाती है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। राज्य सरकारी सेवाओं में बढ़ा हुआ आरक्षण देने वाली धारा 4 को भी अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया गया।
खंडपीठ ने अपने आदेश में साफ लिखा कि धारा 3 उस हद तक रद्द है जहां वह कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत की छत से आगे ले जाती है, क्योंकि यह अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। धारा 4 को भी असंवैधानिक करार दिया गया।
यह सीमा सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंद्रा साहनी फैसले से जुड़ी है, जिसमें नौ न्यायाधीशों की पीठ ने आरक्षण पर 50 प्रतिशत की छत तय की थी। असाधारण परिस्थितियों में अपवाद संभव है, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वर्ग को कुछ प्रतिशत अंक और देने की राज्य की ‘व्यक्तिपरक राय’ इतनी असाधारण नहीं कि इस छत को तोड़ा जा सके।

90 प्रतिशत आबादी का तर्क खारिज
राज्य ने दलील दी थी कि कर्नाटक की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी SC, ST और OBC वर्गों में आती है, इसलिए आरक्षण उसी अनुपात में होना चाहिए। खंडपीठ ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस तर्क को स्वीकार करना संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को नष्ट करने वाला होगा। अदालत ने दोहराया कि 50 प्रतिशत की सीमा राज्य की आरक्षण शक्ति को बांधती है, भले ही पिछड़े वर्गों की संख्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
सरकार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) नागमोहन दास आयोग, न्यायमूर्ति सुभाष बी. आदि की समिति और रत्नप्रभा समिति जैसी रिपोर्टों का हवाला दिया था। अदालत ने माना कि अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और पिछड़ेपन के आंकड़े सीमा के भीतर आरक्षण या आंतरिक आरक्षण जैसे कदमों का आधार बन सकते हैं, लेकिन अकेले इनसे 50 प्रतिशत की छत तोड़ने का कानूनी आधार नहीं बनता।
राष्ट्रीय आयोगों से पहले सलाह जरूरी
याचिकाकर्ताओं—डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति फेडरेशन के राज्य अध्यक्ष महेंद्र कुमार मित्रा तथा बीबीएमपी में सहायक अभियंता पद के आवेदक सागर एच.आर., प्रज्वल कुमार डी. और पुरुषोत्तम गौड़ा जी.एम.—ने यह भी कहा कि राज्य ने अनुच्छेद 338(9) और 338-ए(9) के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से पहले परामर्श नहीं किया।
खंडपीठ ने आरक्षण नीति को प्रमुख नीतिगत विषय मानते हुए दोनों आयोगों से परामर्श को अनिवार्य ठहराया। राज्य ने 10 दिसंबर 2025 और 20 जनवरी 2026 के पत्रों का सहारा लिया, जो कानून बनने के करीब तीन साल बाद और याचिका दायर होने के बाद भेजे गए थे। अदालत ने कहा कि अर्थपूर्ण परामर्श निर्णय से पहले होना चाहिए; बाद में लिखा पत्राचार संवैधानिक शर्त पूरी नहीं करता।

फैसले का असर और आगे का रास्ता
इस आदेश से 2022 के कानून के तहत बढ़ाया गया SC-ST कोटा शिक्षा संस्थानों और राज्य सेवाओं में उस रूप में लागू नहीं रह सकता, जिसमें कुल आरक्षण 56 प्रतिशत हो जाता था। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध सीटों-पदों का पूल फिर से 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा के भीतर संतुलित होने की उम्मीद है, जब तक कोई उच्चतर न्यायालय अन्यथा निर्देश न दे।
पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद बसवराज बोम्मई ने कहा कि राज्य सरकार को इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए; उन्होंने आरोप लगाया कि याचिका SC-ST समुदायों के विकास के विरोध में दायर की गई। राज्य सरकार के अगले कानूनी कदम—अपील या स्थगन याचिका—पर नजर रहेगी।
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