Chowkidar Case Stay: सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ ‘चौकीदार चोर है’ मानहानि ट्रायल पर लगाई रोक, 4 हफ्ते में मांगा जवाब

नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित ‘चौकीदार चोर है’, ‘चोरों के सरदार’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ जैसी टिप्पणियों को लेकर मुंबई की अदालत में चल रहे आपराधिक मानहानि मुकदमे की आगे की कार्यवाही पर शीर्ष अदालत ने रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ राहुल गांधी की याचिका पर नोटिस भी जारी किया, जिसमें मामला रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, “चार सप्ताह में जवाब देने योग्य नोटिस जारी किया जाए। इस बीच, ट्रायल कोर्ट के समक्ष आगे की कार्यवाही स्थगित रहेगी।” राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। आदेश का यह अंश विधि पोर्टल LiveLaw ने साझा किया; ANI ने भी रोक और नोटिस की पुष्टि की।
एक रैली, एक ट्वीट: कहां से शुरू हुआ मामला
मामला 2018 का है, जब राफेल सौदे को लेकर देश की राजनीति गरमाई हुई थी। शिकायत के अनुसार, राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2018 को राजस्थान की एक जनसभा में कहा था—“हिंदुस्तान का चौकीदार चोर है।” इसके चार दिन बाद, 24 सितंबर 2018 को अपने X (तब ट्विटर) अकाउंट पर एक वीडियो पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को ‘कमांडर-इन-थीफ’ कहा था।
भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल ने इन टिप्पणियों को लेकर मुंबई में मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष निजी शिकायत दायर की। उनका तर्क था कि मोदी को ‘चोरों का सरदार’ बताना परोक्ष रूप से भाजपा के हर सदस्य को ‘चोर’ ठहराने जैसा है, इसलिए पार्टी कार्यकर्ता को मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है। गिरगांव मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 2019 में राहुल गांधी को समन जारी कर कार्यवाही शुरू की थी।

हाईकोर्ट ने कहा था—भाजपा ‘पहचान योग्य निकाय’
राहुल गांधी ने नवंबर 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर समन और कार्यवाही को चुनौती दी थी। उनकी ओर से दलील दी गई कि उन्होंने न भाजपा का नाम लिया, न किसी राजनीतिक दल का, और किसी ‘पहचान योग्य या निश्चित वर्ग’ को निशाना नहीं बनाया गया; ऐसे में शिकायतकर्ता के पास मुकदमा चलाने का अधिकार ही नहीं बनता। महाराष्ट्र सरकार ने इसका विरोध किया।
न्यायमूर्ति एन.आर. बोरकर की एकल पीठ ने 8 सितंबर 2026 को यह याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के नाते भाजपा निश्चित रूप से एक पहचान योग्य निकाय है। अदालत ने टिप्पणी की, “प्रथम दृष्टया, भाजपा के सदस्य प्रधानमंत्री को ‘कमांडर इन थीफ’ बताने वाले बयान को केवल पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व तक सीमित नहीं कहा जा सकता। आरोप का सार क्या था और पार्टी सदस्यों पर उसका क्या असर होगा, इस पर ट्रायल के चरण में विचार किया जाएगा।” इसके लिए शशि थरूर मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने बड़ा सवाल
सुप्रीम कोर्ट की रोक का अर्थ है कि जब तक शीर्ष अदालत याचिका पर फैसला नहीं करती या कोई अगला आदेश नहीं देती, मुंबई की निचली अदालत में ट्रायल आगे नहीं बढ़ेगा। प्रतिवादियों का जवाब आने के बाद अदालत यह परखेगी कि क्या किसी दल का कार्यकर्ता, पार्टी का नाम लिए बिना उसके नेता पर की गई टिप्पणी के लिए, आपराधिक मानहानि का मुकदमा चला सकता है। इसका उत्तर चुनावी भाषणों से जुड़े मानहानि मामलों के लिए नजीर बन सकता है।

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