अक्टूबर 24, 2026
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Illegal Arrest: 26 दिन की अवैध हिरासत पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार देगी ₹5 लाख

मुंबई: डेवलपर के दफ्तर में फ्लैट का सौदा चल रहा था। ₹2 लाख का एडवांस हाथ में आया ही था कि पुलिस अंदर आई, हथकड़ी लगाई और उगाही के आरोप में थाने ले गई। इसके बाद 26 दिन हिरासत में बीते। नौ साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस गिरफ्तारी को अवैध ठहराया है और महाराष्ट्र सरकार को पीड़ित कारोबारी को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है।

हरियाली और ताड़ के पेड़ों के बीच मुंबई में बॉम्बे हाईकोर्ट की गॉथिक शैली की ऐतिहासिक इमारत
मुंबई में बॉम्बे हाईकोर्ट की इमारत (11 अगस्त 2025, फाइल फोटो)। फोटो: Gnoeee / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

जस्टिस अजेय एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाटा की खंडपीठ ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को दिए फैसले में साफ कहा कि यह डेवलपर और पुलिस की मिलीभगत से कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला है। अदालत ने जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तुरंत निलंबन समेत सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है और रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट की भूमिका भी हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने रखने को कहा है।

बड़ा फैसला: ‘गहरी पीड़ा हुई’

फैसला जस्टिस कमल खाटा ने लिखा है। अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता को सुनने के बाद यह सोचकर हमें गहरी पीड़ा हुई कि उन पर क्या बीती होगी।” पीठ के मुताबिक यह “एक क्लासिक मामला” है, जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अपने पद का फायदा उठाया और अपने अधीन पुलिस मशीनरी को डेवलपर के हित में “हथियार” बना दिया, ताकि याचिकाकर्ता की जिंदगी तबाह की जा सके, क्योंकि उन्होंने दबाव में आकर पेश किया गया सौदा मंजूर नहीं किया था।

हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड को “ज्यादती भरी, मनमानी और बिना दिमाग लगाए” की गई कार्रवाई बताया। पीठ के मुताबिक पुलिस ने बिना किसी सबूत के उन्हें गैंगस्टर या हिस्ट्रीशीटर की तरह पेश करने की कोशिश की।

बॉम्बे हाईकोर्ट की इमारत के शिखर पर तराजू और तलवार थामे न्याय की देवी की प्रतिमा
बॉम्बे हाईकोर्ट की इमारत के ऊपर लगी न्याय की देवी की प्रतिमा (31 अगस्त 2012, फाइल फोटो)। फोटो: Ronakshah1990 / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

फ्लैट का सौदा, ₹2 लाख और हथकड़ी

फैसले में दर्ज ब्योरे के मुताबिक, दक्षिण मुंबई के वालकेश्वर में रहने वाले 49 वर्षीय बिपिन सतीशचंद्र अग्रवाल कारोबारी हैं। उनकी करीब 70 साल की सास का फ्लैट अंधेरी ईस्ट की एक हाउसिंग सोसाइटी में था, जिसका पुनर्विकास हो रहा था। सास ने बिल्डर से बातचीत के लिए अग्रवाल को अपना अटॉर्नी बनाया था।

4 अगस्त 2017 की शाम अग्रवाल न्यू मरीन लाइंस में डेवलपर के दफ्तर पहुंचे। करीब ₹1.64 करोड़ में फ्लैट बेचने की बात हुई और सौदा पक्का करने के लिए उन्हें ₹2 लाख एडवांस दिए गए। रकम लेते ही पुलिस पहुंच गई और उन्हें आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ले जाया गया। डेवलपर की शिकायत पर IPC की धारा 384 (उगाही) के तहत FIR दर्ज की गई।

अगले दिन मजिस्ट्रेट ने उन्हें पुलिस हिरासत में भेज दिया, जो 10 अगस्त तक चली। फिर न्यायिक हिरासत मिली। 28 अगस्त 2017 को सेशंस कोर्ट से ₹25,000 के मुचलके पर जमानत मिलने के बाद वे बाहर आए। अग्रवाल ने हाईकोर्ट में खुद अपना केस लड़ा। पीठ ने फैसले में लिखा कि उन्होंने पूरी सुनवाई “गरिमा, शांति और पेशेवर तरीके” से संभाली।

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रिकॉर्ड में क्या-क्या गड़बड़ मिली

हाईकोर्ट ने पुलिस के दस्तावेजों की एक-एक कर पड़ताल की और कई गंभीर खामियां गिनाईं:

  • अरेस्ट फॉर्म में चार जगह 5 अगस्त 2017 की तारीख लिखी थी, जिसे तीन जगह काटकर 4 अगस्त किया गया। अदालत ने इसे कानूनन रखे जाने वाले दस्तावेज से छेड़छाड़ माना।
  • स्टेशन डायरी के समय से पता चलता है कि FIR गिरफ्तारी के बाद दर्ज हुई, पहले नहीं।
  • पुलिस ने 23 जून 2017 की लिखित शिकायत का दावा किया, लेकिन RTI के जवाब में पुलिस ने ही कहा कि ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली थी।
  • अरेस्ट फॉर्म में गिरफ्तारी के आधार और आरोपी के कानूनी अधिकारों वाला कॉलम खाली था। बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड के उन्हें आदतन अपराधी बताया गया।
  • वॉइस सैंपल फॉरेंसिक लैब भेजा गया, जांचा गया, रिपोर्ट बनी और थाने लौट भी आया, सब एक ही दिन, 18 अक्टूबर 2017 को। अदालत ने इसे सामान्य फॉरेंसिक प्रक्रिया से मेल न खाने वाला बताया।

धारा 41A के तहत पेश होने का नोटिस भी गिरफ्तारी के बाद रात करीब 8:20 बजे दिया गया। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी नोटिस से पहले हुई, इसलिए स्थापित कानून के तहत यह “निस्संदेह अवैध” थी।

मुंबई में पुलिस आयुक्त कार्यालय की ऐतिहासिक इमारत
मुंबई पुलिस आयुक्त का कार्यालय (31 अगस्त 2008, फाइल फोटो)। फोटो: Nicholas (Nichalp) / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

गिरफ्तारी से पहले चार सवाल, जिनका जवाब नहीं मिला

सुनवाई में राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया। सब-इंस्पेक्टर के वकील ने दलील दी कि उन्होंने बॉम्बे पुलिस मैनुअल के नियमों का पालन किया, मजिस्ट्रेट के रिमांड आदेश से गिरफ्तारी की वैधता पर मुहर लग गई और पंचनामे के मुताबिक वे गिरफ्तारी के समय मौजूद नहीं थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार और सतेंदर कुमार अंतिल फैसलों का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि ये दोनों फैसले पुलिस नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के पक्ष में जाते हैं। सतेंदर कुमार अंतिल फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि पुलिस अधिकारी सिर्फ सवाल पूछने के लिए किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकता। अर्नेश कुमार फैसले की कसौटी पर अदालत ने पूछा कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी थी, क्या सच में जरूरी थी, इससे क्या मकसद पूरा होता और क्या हासिल होता। पीठ के मुताबिक पुलिस के पास इनमें से किसी सवाल का कानूनी तौर पर ठोस जवाब नहीं था।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता डेवलपर के लिए अनजान नहीं थे, बल्कि एक फ्लैट मालिक के अटॉर्नी थे। एक प्राथमिक पूछताछ से ही सच सामने आ जाता, लेकिन पुलिस ने यह जानने की कोशिश तक नहीं की कि नकदी किस बात के लिए दी गई थी।

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मजिस्ट्रेट पर भी सवाल

फैसले का सबसे अहम हिस्सा यह है कि अदालत सिर्फ पुलिस पर नहीं रुकी। पीठ ने कहा कि मुंबई की 64वीं अदालत के मजिस्ट्रेट भी याचिकाकर्ता की गलत हिरासत के लिए जिम्मेदार थे, क्योंकि रिमांड जारी रखने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया। अदालत के शब्दों में, मजिस्ट्रेट ने “स्वतंत्र रूप से दिमाग नहीं लगाया” और “बेहद लापरवाह रवैया” अपनाया।

इसलिए रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि फैसला हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने रखा जाए, ताकि अगस्त 2017 में रिमांड और जमानत अर्जियां सुनने वाले मजिस्ट्रेट पर उचित कार्रवाई हो सके।

सरकार को दो हफ्ते की मोहलत

हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य सरकार छह दिन की पुलिस हिरासत और 20 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए अग्रवाल को ₹5 लाख का मुआवजा दे। यह रकम फैसला हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड होने के दो हफ्ते के भीतर चुकानी होगी। राज्य को संबंधित सब-इंस्पेक्टर और बाकी जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ तुरंत निलंबन समेत सख्त कार्रवाई करनी होगी और वह चाहे तो मुआवजे का अनुपातिक हिस्सा उनकी तनख्वाह से वसूल सकता है।

अदालत ने माना कि इस अवैध गिरफ्तारी से याचिकाकर्ता को भारी आर्थिक नुकसान हुआ, उनकी प्रतिष्ठा को ऐसी चोट पहुंची जिसकी भरपाई नहीं हो सकती और उनकी साख पर स्थायी दाग लगा। फैसले पर महाराष्ट्र सरकार या मुंबई पुलिस की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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यह फैसला उस बुनियादी सवाल को फिर सामने रखता है, जो हर गिरफ्तारी से पहले पूछा जाना चाहिए: क्या इसकी सच में जरूरत है? बॉम्बे हाईकोर्ट का जवाब साफ है कि जब पुलिस इसका जवाब नहीं दे सकती, तो किसी की आजादी छीनने की कीमत राज्य को चुकानी होगी।

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