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Plague Alert: रूस में लैब कर्मी की मौत के बाद भारत में लैब नेटवर्क अलर्ट, घबराने की जरूरत नहीं

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से ली गई प्लेग बैक्टीरिया यर्सिनिया पेस्टिस की तस्वीर

नई दिल्ली: रूस के साइबेरिया में एक लैब कर्मचारी की मौत और उससे जुड़ी प्लेग की आशंका की खबरों के बाद भारत ने एहतियातन अपना राष्ट्रीय लैब नेटवर्क अलर्ट पर रख दिया है। अंग्रेजी अखबार मिंट ने रविवार को दो सरकारी अधिकारियों के हवाले से बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं के स्टॉक की भी समीक्षा की है। अधिकारियों का साफ कहना है कि फिलहाल देश में संक्रमण फैलने का खतरा नगण्य है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

यह Plague Alert पूरी तरह सावधानी के तौर पर उठाया गया कदम है। रूस ने खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को बताया है कि वहां हाल में प्लेग का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है, और WHO को भी अब तक संक्रमण के आगे फैलने का कोई सबूत नहीं मिला है।

रूस में क्या हुआ था

WHO की 10 अक्टूबर को जारी डिजीज आउटब्रेक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के इर्कुत्स्क स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक कर्मचारी को 29 सितंबर को गंभीर निमोनिया के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था और 2 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई। मीडिया रिपोर्टों में लैब में संपर्क के बाद न्यूमोनिक प्लेग की आशंका जताई गई थी। मिंट के अनुसार, मृतक 28 वर्षीय लैब तकनीशियन थीं।

WHO के अनुरोध पर रूस के अधिकारियों ने बताया कि इर्कुत्स्क क्षेत्र में हाल में प्लेग का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ, लैब में बायोसिक्योरिटी से जुड़ी कोई घटना नहीं हुई और मृतक व उनके सभी संपर्कों की जांच में किसी खतरनाक रोगाणु की पुष्टि नहीं हुई। सभी संपर्क लक्षण-रहित रहे। WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने बताया कि रूस ने करीब 200 संपर्कों को क्वारंटीन किया था।

हालांकि WHO ने एक अहम अनिश्चितता की ओर भी इशारा किया है: मृतक की बीमारी की असली वजह अब तक पुष्ट नहीं हुई है। रूस ने इसे “अज्ञात कारण वाला निमोनिया” बताया है। WHO के मुताबिक, चूंकि मृतक खतरनाक रोगाणुओं पर काम करने वाले संस्थान में थीं, इसलिए लैब में संपर्क की संभावना को इस चरण में पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। संगठन ने कहा है कि वह स्थिति पर नजर रखे हुए है।

भारत ने क्या तैयारी की है

मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य मंत्रालय का एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) स्थिति पर नजर रख रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की जांच सुविधाओं और राज्य स्तर की रेफरेंस लैब्स को तैयार रहने और तय प्रोटोकॉल का पालन करने को कहा गया है। प्लेग के इलाज में इस्तेमाल होने वाली टेट्रासाइक्लिन समेत जरूरी एंटीबायोटिक के केंद्रीय भंडार का ऑडिट भी किया गया है।

एक अधिकारी ने मिंट से कहा, “हमने अपने पूरे लैब नेटवर्क में निगरानी और सभी एहतियाती कदम सक्रिय कर दिए हैं, ताकि किसी भी असामान्य स्थिति का जल्दी पता चल सके। फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है, हम WHO के लगातार संपर्क में हैं।” गौरतलब है कि 1994 में गुजरात के सूरत में फैले प्लेग के बाद से भारत इस बीमारी को लेकर निगरानी प्रोटोकॉल बनाए हुए है।

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की कोचीन शाखा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन ने मिंट से कहा कि भारत तक इस रोगाणु के पहुंचने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि मृतक के संपर्कों में संक्रमण फैलने की कोई खबर नहीं है। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. जतिन आहूजा ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सिर्फ रूस की खबरों के आधार पर लोगों को डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन डॉक्टरों को मिलते-जुलते मामलों को जल्दी पहचानने के लिए सतर्क रहना चाहिए।

प्लेग क्या है: WHO के अनुसार अहम तथ्य

WHO के मुताबिक, प्लेग यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) नाम के बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है, जो आमतौर पर छोटे जानवरों और उनके पिस्सुओं में पाया जाता है। संक्रमण के बाद आमतौर पर एक से सात दिन में लक्षण दिखते हैं। अच्छी बात यह है कि एंटीबायोटिक इलाज इस पर असरदार है, इसलिए समय पर जांच और इलाज से जान बचाई जा सकती है।

प्रकारकैसे फैलता हैप्रमुख लक्षण
ब्यूबोनिक (सबसे आम)संक्रमित पिस्सू के काटने से; इंसान से इंसान में बहुत कमअचानक बुखार, ठंड लगना, सिर व शरीर में दर्द, कमजोरी, उल्टी-मितली, दर्दनाक सूजी हुई लसिका ग्रंथियां
न्यूमोनिक (फेफड़ों वाला)मरीज की सांस की बूंदों से इंसान से इंसान मेंसांस फूलना, खांसी, कई बार बलगम में खून; लक्षण 24 घंटे से भी कम में दिख सकते हैं
सेप्टिसीमिक (खून में)किसी भी प्रकार से विकसित हो सकता हैत्वचा के नीचे रक्तस्राव, अंगों का काम करना बंद होना, सांस में गंभीर तकलीफ
स्रोत: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का प्लेग फैक्ट शीट

WHO के अनुसार, न्यूमोनिक और सेप्टिसीमिक प्लेग इलाज न मिलने पर जानलेवा होते हैं, लेकिन लक्षण शुरू होने के 24 घंटे के भीतर पहचान और इलाज हो जाए तो ठीक होने की दर ऊंची है। इसलिए किसी को भी तेज बुखार, सांस की गंभीर तकलीफ या खून वाली खांसी हो, तो खुद दवा लेने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

निष्कर्ष

भारत का यह कदम घबराहट का नहीं, तैयारी का संकेत है। रूस में मौत की वजह अभी पुष्ट नहीं है, आगे संक्रमण का कोई सबूत नहीं मिला है और भारत में इसका खतरा अधिकारियों व विशेषज्ञों के अनुसार बेहद कम है। ऐसे में सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट खबरों पर भरोसा करने के बजाय स्वास्थ्य मंत्रालय और WHO की आधिकारिक जानकारी पर ही नजर रखें।

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