UN Experts India Protests: युवाओं के प्रदर्शनों पर सख्ती से UN विशेषज्ञ चिंतित, भारत ने UN में अपुष्ट आरोपों का किया विरोध

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र (UN) के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में पिछले तीन महीनों से चल रहे युवाओं के प्रदर्शनों पर पुलिस की सख्ती को लेकर चिंता जताई है। जिनेवा से मंगलवार, 20 अक्टूबर को जारी बयान में विशेषज्ञों ने कहा, “यह कार्रवाई एक व्यापक और चिंताजनक पैटर्न को दिखाती है।” उन्होंने भारत सरकार से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने और प्रदर्शनों के दौरान हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की निष्पक्ष जांच कराने को कहा है।
इसी बीच न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत ने साफ कहा कि मानवाधिकारों को राजनीतिक दबाव या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकर ने कहा कि अपुष्ट आरोपों और अधूरे आंकड़ों के सहारे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नकारात्मक छवि गढ़ने की किसी भी कोशिश का भारत औपचारिक रूप से विरोध करता है।
UN विशेषज्ञों ने क्या आरोप लगाए
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) की ओर से जारी बयान के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदर्शन अहिंसक होने के बावजूद पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर लाठीचार्ज किया और हजारों लोगों को प्रदर्शनों में शामिल होने से रोका। बयान में यह भी कहा गया है कि हाल में दिल्ली में 7,000 से ज्यादा युवाओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और राजनीतिक दलों के सदस्यों को कथित तौर पर मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर लोगों को, जिनमें आंदोलन के नेता भी शामिल थे, 24 घंटे बाद छोड़ दिया गया।
विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों को दूर बने हिरासत केंद्रों में भेजा गया, उनके फोन जब्त किए गए और प्रदर्शन से जुड़ी सामग्री मिटा दी गई। उन्होंने प्रदर्शनों और हिरासत के दौरान यौन हिंसा व महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरों पर खास चिंता जताई। बयान में मार्च की उस घटना का भी जिक्र है, जिसमें सादी वर्दी में आए पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर छात्र और श्रमिक अधिकारों से जुड़े 10 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, उन्हें 24 घंटे से ज्यादा समय तक किसी से संपर्क नहीं करने दिया गया और बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई के बाद ही रिहा किया गया।
धारा 163 और इंटरनेट बंदी पर भी सवाल
विशेषज्ञों ने उन खबरों पर भी चिंता जताई, जिनके मुताबिक भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सार्वजनिक सभाओं पर व्यापक रोक लगाई गई, सार्वजनिक परिवहन रोका गया और इंटरनेट बंद किया गया। उनका कहना है, “ये कदम भारत के बुनियादी अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का उल्लंघन हैं, जिनमें शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्रता और व्यक्ति की सुरक्षा के अधिकार शामिल हैं।”
बयान में सरकार से तीन बड़ी मांगें की गई हैं। पहली, बल का अत्यधिक इस्तेमाल तुरंत बंद हो। दूसरी, सभाओं पर लगी व्यापक रोक हटाई जाए। तीसरी, बायोमेट्रिक समेत डिजिटल निगरानी और इंटरनेट बंदी का दुरुपयोग न हो। विशेषज्ञों ने पुलिस और उससे जुड़े बलों के आचरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और गहन जांच बिना देरी शुरू करने की मांग भी की, ताकि जवाबदेही तय हो और पीड़ितों को मुआवजा मिले।
UN महासभा में भारत ने क्या कहा

भारत का यह बयान महासभा की तीसरी समिति में ‘जबरन गुमशुदगी पर कार्य समूह’ (Working Group on Enforced Disappearances) से जुड़े एजेंडे पर आया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने बुधवार तड़के X पर इसका वीडियो साझा किया। बरखा ताम्रकर ने कहा, “भारत एक जीवंत लोकतंत्र है, जिसकी नींव कानून के शासन पर टिकी है।” उन्होंने बताया कि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है और स्वतंत्र न्यायपालिका बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी कर सकती है, जो किसी भी कथित गुमशुदगी के खिलाफ मजबूत सुरक्षा कवच है।
ताम्रकर ने कहा कि भारत में कानून लागू करने वाली एजेंसियां कानून के दायरे में काम करने के लिए बाध्य हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग शिकायत और निवारण का प्रभावी मंच देते हैं, जबकि सूचना का अधिकार कानून, स्वतंत्र मीडिया और सक्रिय नागरिक समाज पारदर्शिता को और मजबूत करते हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत ने जबरन गुमशुदगी से सभी लोगों की सुरक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं।
अपने बयान के आखिर में उन्होंने कहा, “हम प्रतिनिधिमंडलों से अपील करते हैं कि वे रिपोर्ट का हवाला ईमानदारी से दें और मानवीय आधार पर भेजे गए किसी पत्र को फैसले की तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश न करें।” उन्होंने कहा कि भारत ठीक से दर्ज किए गए किसी भी खास मामले पर तय माध्यमों से स्पष्टीकरण देने को तैयार है, लेकिन ऐसी किसी रिपोर्ट को, जिसमें भारत को लेकर कोई टिप्पणी ही नहीं है, देश के खिलाफ नकारात्मक धारणा में बदलने की कोशिश का विरोध करता है।
पहले भी आरोपों को खारिज कर चुका है भारत
यह पहला मौका नहीं है जब संयुक्त राष्ट्र की ओर से इन प्रदर्शनों पर टिप्पणी आई हो। इसी महीने दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों के दौरान हुई हिरासतों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने चिंता जताई थी। तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 11 अक्टूबर को X पर जारी वीडियो बयान में कहा था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान से मिला है और मजबूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया इसकी रक्षा करते हैं।
जायसवाल ने कहा था, “हर लोकतंत्र की तरह भारतीय नागरिक भी सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखते हुए इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। हमारी कानून लागू करने वाली एजेंसियां पूरी तरह कानून के मुताबिक काम करती हैं और किसी भी शिकायत के निवारण के लिए हमारी अदालतें सबके लिए खुली हैं।” उन्होंने OHCHR की चिंताओं को अनुचित और भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य दखल बताया था। जायसवाल ने यह भी कहा था कि पड़ोस में प्रदर्शनों पर हुई हिंसक कार्रवाइयों पर यह संस्था चुप रही, और ऐसा दोहरा रवैया उसकी साख को कमजोर करता है।
किन प्रदर्शनों की हो रही है बात
UN विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में छात्र और उनके समर्थक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों के खिलाफ सड़कों पर उतरे। हाल के प्रदर्शन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर हुए हैं, जिनमें विपक्षी दल और छात्र संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि सूची से दोहराव वाले, मृत और दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और गलती से छूटा कोई भी व्यक्ति अपील कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के ये विशेषज्ञ मानवाधिकार परिषद की ओर से नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं। वे UN के कर्मचारी नहीं होते और उनके बयान किसी अदालत का फैसला नहीं माने जाते। विशेषज्ञों के इस ताजा बयान पर विदेश मंत्रालय की अलग से कोई प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।
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