अक्टूबर 24, 2026
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Election Affidavit: उम्मीदवार ने दी झूठी जानकारी तो अब वोटर भी कर सकेगा केस

नई दिल्ली: चुनाव लड़ने वाला कोई उम्मीदवार अगर नामांकन पत्र या उसके साथ दिए जाने वाले हलफनामे में जानबूझकर झूठी जानकारी देता है या कोई जानकारी छिपाता है, तो उसके खिलाफ अब आम मतदाता भी सीधे अदालत में आपराधिक शिकायत दायर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ किया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 125-A के तहत ऐसी शिकायत करने का अधिकार सिर्फ चुनाव आयोग या किसी लोक सेवक तक सीमित नहीं है।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की इमारत
नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट की इमारत (फाइल फोटो)। फोटो: Pinakpani / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने 16 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। इसे ‘रिपोर्टेबल’ यानी नजीर बनने लायक फैसले के रूप में दर्ज किया गया है (2026 INSC 1138)। जस्टिस दत्ता ने फैसला लिखा है। कोर्ट ने माना कि यह आम लोगों के लिए अहमियत रखने वाला कानूनी सवाल था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अब तक कोई फैसला नहीं दिया था।

हाई कोर्ट ने क्या कहा था

मामला कर्नाटक से जुड़ा है। बीदर से 2023 में चुने गए एक विधायक के खिलाफ राजकुमार मडकी नाम के व्यक्ति ने 21 अगस्त 2023 को बेंगलुरु की एक मजिस्ट्रेट अदालत में निजी शिकायत दायर की थी। आरोप था कि विधायक ने नामांकन के साथ दिए हलफनामे में अपने निवास के पते को लेकर गलत जानकारी दी।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 7 मार्च 2025 को यह शिकायत रद्द कर दी। हाई कोर्ट की राय थी कि धारा 125-A के मामलों पर भी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195(1) की शर्त लागू होगी, इसलिए ऐसी शिकायत केवल चुनाव आयोग ही कर सकता है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि मतदाता के पास सिर्फ चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार है, निजी आपराधिक शिकायत का नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील क्यों नहीं मानी

CrPC की धारा 195(1) कहती है कि कुछ तय अपराधों, जैसे भारतीय दंड संहिता की धारा 172 से 188 तक के अपराधों, पर अदालत तभी संज्ञान लेगी जब संबंधित लोक सेवक लिखित शिकायत करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस सूची में जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-A का कहीं जिक्र ही नहीं है।

बेंच ने तारीखों के जरिए अपनी बात समझाई। धारा 125-A को 24 अगस्त 2002 से कानून में जोड़ा गया था, जबकि CrPC की धारा 195 में उसके करीब चार साल बाद अप्रैल 2006 में संशोधन हुआ। कोर्ट के मुताबिक, विधायिका को धारा 125-A की जानकारी थी, फिर भी उसने इसे धारा 195 के दायरे में नहीं रखा। इसलिए इस चूक को जानबूझकर किया गया फैसला माना जाएगा।

फैसले में कहा गया, “अगर विधायिका की सचमुच यह मंशा होती कि चुनाव जीतने के इरादे से हलफनामे में झूठी जानकारी देने के अपराध पर संज्ञान तभी लिया जा सके, जब शिकायतकर्ता लोक सेवक हो, तो यह CrPC की धारा 195 में संशोधन करके किया जा सकता था।” कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि धारा 125-A की शिकायत केवल लोक सेवक ही कर सकता है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में हावड़ा के एक मतदान केंद्र पर कतार में खड़े मतदाता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण में 29 अप्रैल 2026 को हावड़ा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र पर कतार में खड़े मतदाता (प्रतीकात्मक फोटो)। फोटो: भारत निर्वाचन आयोग / Wikimedia Commons (GODL-India)

क्या है धारा 125-A और कितनी है सजा

जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-A के तहत वह उम्मीदवार सजा का हकदार है, जो खुद या अपने प्रस्तावक के जरिए चुनाव जीतने के इरादे से नामांकन पत्र या हलफनामे में:

  • धारा 33-A के तहत जरूरी जानकारी नहीं देता,
  • ऐसी जानकारी देता है जिसके झूठे होने की उसे जानकारी हो या ऐसा मानने का कारण हो,
  • या कोई जानकारी छिपाता है।

इस अपराध में छह महीने तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। फैसले में दर्ज दलीलों के मुताबिक, धारा 33-A और 125-A को 2002 में सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ फैसले के बाद जोड़ा गया था। उस फैसले में कहा गया था कि मतदाताओं को उम्मीदवारों की संपत्ति, शैक्षणिक योग्यता और आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में जानने का हक है। उम्मीदवार यह ब्योरा फॉर्म 26 के हलफनामे में देते हैं।

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चुनाव आयोग के प्रेस नोट पर क्या बोला कोर्ट

सुनवाई के दौरान विधायक की ओर से चुनाव आयोग के 16 जून 2020 के एक प्रेस नोट का हवाला दिया गया। इसमें आयोग ने कहा था कि वह हलफनामों में गंभीर चूक की ओर इशारा करने वाली शिकायतों पर संज्ञान लेगा और ऐसे मामलों को केस-दर-केस आधार पर जांच एजेंसियों के पास भेजेगा। उसी नोट में यह भी दर्ज था कि लोग ऐसी शिकायतें धारा 125-A के तहत सक्षम अदालत में दायर कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की सीधी व्याख्या से ही सवाल का जवाब मिल जाता है, इसलिए आयोग के स्पष्टीकरणों पर निर्भर होने की जरूरत नहीं है। बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग अपने क्षेत्र में सर्वोच्च है, लेकिन कानूनों की व्याख्या मुख्य रूप से अदालतों का काम है और आयोग के दिशानिर्देश या प्रेस नोट अदालत पर बाध्यकारी नहीं हैं।

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झूठी शिकायतों की बाढ़ का डर

विधायक के वकील की दलील थी कि अगर निजी शिकायतों की छूट दी गई, तो चुनाव हारने वाले उम्मीदवार दूसरों के जरिए जीते हुए प्रतिनिधियों पर बेबुनियाद मुकदमे करवा सकते हैं। कोर्ट ने इस आशंका का जवाब देते हुए कहा कि अगर कोई शिकायत किसी निर्वाचित उम्मीदवार को परेशान करने के लिए की जाती है या उसमें बेबुनियाद आरोप लगाए जाते हैं, तो देश के कानून सक्षम मजिस्ट्रेटों को हर मामले के तथ्यों के मुताबिक उचित आदेश देने का पूरा अधिकार देते हैं।

जिस केस में फैसला आया, उसका क्या हुआ

कानूनी सवाल पर शिकायतकर्ता के पक्ष में राय देने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस खास मामले में शिकायत को दोबारा जिंदा नहीं किया। बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेजों से पहली नजर में निवास को लेकर लगाए गए आरोप का प्रभावी ढंग से खंडन हो चुका है और दोषसिद्धि की संभावना बेहद कम है। ऐसे में ट्रायल जारी रखना सिर्फ अदालत का कीमती समय खर्च करेगा।

इसलिए शिकायत रद्द करने का हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रहा, लेकिन उसकी वजह बदल गई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि निजी व्यक्ति ऐसी शिकायत नहीं कर सकता। अपील का निपटारा कर दिया गया और दोनों पक्षों को अपना खर्च खुद उठाने को कहा गया।

मतदाताओं के लिए इसका मतलब

इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि हलफनामे में झूठी जानकारी या जानकारी छिपाने के आरोप पर कोई भी व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक शिकायत दायर कर सकता है। इसके लिए चुनाव आयोग या रिटर्निंग ऑफिसर की शिकायत का इंतजार जरूरी नहीं है। शिकायत पर आगे कार्रवाई होगी या नहीं, यह मजिस्ट्रेट मामले के तथ्यों और सबूतों को देखकर तय करेंगे।

यह मामला 2023 में दायर शिकायत से जुड़ा था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सुनवाई पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के प्रावधानों के आधार पर की। चुनाव में जीत-हार को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का रास्ता पहले की तरह खुला है। यह फैसला उससे अलग, आपराधिक कार्रवाई के रास्ते को लेकर है।

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