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Agentic AI: सरकारी सेवाओं के लिए CoRover बनाएगी साझा AI प्लेटफॉर्म, शुरुआत डिजीलॉकर से

डेटा सेंटर में नीली रोशनी वाले सर्वर रैक की कतारें

नई दिल्ली: सरकारी सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सरकारी सेवाओं के लिए एक साझा Agentic AI प्लेटफॉर्म बनाने का जिम्मा भारतीय कंपनी CoRover.ai को सौंपा है। इस प्लेटफॉर्म का पहला इस्तेमाल डिजीलॉकर में होगा, जहां लोग एक एआई असिस्टेंट के जरिए अपने दस्तावेजों से जुड़े काम कर सकेंगे।

सीएनबीसी-टीवी18 और न्यूजबाइट्स की 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अनुबंध नेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन (NeGD) ने गुणवत्ता और लागत पर आधारित चयन प्रक्रिया (QCBS) के बाद दिया है। CoRover वही कंपनी है, जो भारतजीपीटी (BharatGPT) प्लेटफॉर्म विकसित करती है।

कैसे हुआ चयन, किसे कितने अंक मिले

सरकार के मूल्यांकन दस्तावेज का हवाला देते हुए रिपोर्ट्स में बताया गया है कि CoRover को अंतिम मूल्यांकन में 100 अंक मिले और वह शीर्ष बोलीदाता रही। दूसरे नंबर पर काइंड्रिल सॉल्यूशंस (Kyndryl Solutions) रही, जिसे 91.24 अंक मिले। CoRover के मुताबिक, इस टेंडर में 80 से ज्यादा कंपनियों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से छह को देशभर में काम के लिए सूचीबद्ध (एम्पैनल) किया गया।

मुख्य बिंदुविवरण
परियोजनासरकारी सेवाओं के लिए साझा एजेंटिक एआई प्लेटफॉर्म
चयनित कंपनीCoRover.ai (भारतजीपीटी की डेवलपर)
अनुबंध देने वाली संस्थानेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन (NeGD), MeitY
चयन प्रक्रियागुणवत्ता और लागत आधारित चयन
अंकCoRover: 100, काइंड्रिल सॉल्यूशंस: 91.24
पहला इस्तेमालडिजीलॉकर
समय-सीमा4 महीने विकास + 12 महीने संचालन और रखरखाव

स्रोत: सीएनबीसी-टीवी18, न्यूजबाइट्स

क्या होता है एजेंटिक एआई और डिजीलॉकर में क्या बदलेगा

आम चैटबॉट सिर्फ सवालों के जवाब देते हैं, जबकि ‘एजेंटिक एआई’ ऐसे सिस्टम को कहा जाता है जो उपयोगकर्ता की ओर से किसी काम को कई चरणों में पूरा भी कर सके, जैसे किसी दूसरे सिस्टम से जानकारी लेना या कोई प्रक्रिया आगे बढ़ाना। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सरकारी प्लेटफॉर्म पर एआई एजेंट जुड़े हुए सरकारी सिस्टम के जरिए काम कर सकेंगे, लेकिन इसके लिए ऑथेंटिकेशन, उपयोगकर्ता की सहमति और अन्य नियंत्रण अनिवार्य होंगे।

डिजीलॉकर इस प्लेटफॉर्म का पहला पड़ाव होगा। पहले संस्करण में उपयोगकर्ता एक एआई असिस्टेंट से बातचीत करके दस्तावेजों और उससे जुड़े सरकारी सिस्टम से संबंधित काम कर सकेंगे। डिजीलॉकर पर यह काम दो चरणों में होगा: चार महीने का विकास चरण और उसके बाद 12 महीने का संचालन व रखरखाव। हालांकि आम लोगों के लिए यह सुविधा कब से उपलब्ध होगी, इसकी कोई आधिकारिक तारीख अभी सामने नहीं आई है।

एक प्लेटफॉर्म, कई विभाग

इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि हर विभाग के लिए अलग-अलग एआई सिस्टम बनाने के बजाय एक साझा प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा। इस पर अलग-अलग सरकारी विभाग अपनी सेवाओं के लिए एआई असिस्टेंट और बॉट बना और चला सकेंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसका मकसद अलग-अलग इस्तेमाल के लिए अलग-अलग सिस्टम बनाने की जरूरत को खत्म करना है।

सुरक्षा पर खास जोर

सरकारी सेवाओं में एआई के इस्तेमाल के साथ डेटा सुरक्षा और गलत इस्तेमाल की चिंता भी जुड़ी रहती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेंडर में इन जोखिमों से निपटने के लिए कई प्रावधान रखे गए हैं:

  • मॉडल और प्रॉम्प्ट मैनेजमेंट पर नियंत्रण, साथ ही निगरानी और सुरक्षा के उपाय
  • ‘प्रॉम्प्ट इंजेक्शन’ और ‘जेलब्रेक’ जैसी कोशिशों से बचाव, जिनमें एआई को चालाकी से गलत काम के लिए उकसाया जाता है
  • एआई एजेंट की गतिविधि, काम पूरा होने, विफलताओं, प्रतिक्रिया समय (लेटेंसी) और एआई पर होने वाले खर्च की निगरानी
  • किसी भी काम से पहले ऑथेंटिकेशन और उपयोगकर्ता की सहमति

निष्कर्ष

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में भारत पहले ही आधार, यूपीआई और डिजीलॉकर जैसे मॉडल दुनिया के सामने रख चुका है। अब एक भारतीय कंपनी के हाथों साझा एजेंटिक एआई प्लेटफॉर्म तैयार होना इसी कड़ी का अगला कदम माना जा रहा है। असली परीक्षा तब होगी, जब यह सुविधा करोड़ों डिजीलॉकर उपयोगकर्ताओं तक पहुंचेगी और यह साबित करना होगा कि एआई सरकारी कामकाज को आसान बनाने के साथ-साथ लोगों के डेटा को भी सुरक्षित रख सकता है।

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