Rupee Fall: रुपये में गिरावट थामने को RBI ने कड़े किए फॉरेक्स नियम

मुंबई: डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहे रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शनिवार को बड़ा और सख्त कदम उठाया। रुपये में गिरावट रोकने के लिए केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार के नियम कड़े कर दिए हैं और सरकारी तेल कंपनियों के लिए डॉलर की अलग खिड़की खोल दी है। बाजार के जानकार इसे हाल के वर्षों में रुपये के बचाव के लिए उठाए गए सबसे मजबूत कदमों में गिन रहे हैं।
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जो उसके अब तक के सबसे निचले बंद स्तर 96.82 के बेहद करीब है। इस साल रुपया करीब 7 फीसदी टूट चुका है और एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन वाली मुद्राओं में शामिल है।
रुपये में गिरावट रोकने के लिए RBI के नए नियम
RBI ने जो कदम उठाए हैं, उनका सीधा निशाना सट्टेबाजी वाली डॉलर मांग है। रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य बदलाव ये हैं:
- फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR): 20 लाख डॉलर से ज्यादा के हर फॉरेक्स डेरिवेटिव सौदे पर बैंकों को उसकी नोशनल वैल्यू के 20 फीसदी के बराबर रकम रुपये में RBI के पास रखनी होगी।
- दोबारा बुकिंग पर रोक: निर्देश जारी होने के बाद किसी भी बैंक के साथ रद्द किए गए रुपये से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक नहीं किया जा सकेगा। हालांकि मैच्योरिटी पर रोलओवर की छूट बनी रहेगी।
- सीमा में भारी कटौती: बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर साबित किए होने वाले फॉरेक्स डेरिवेटिव सौदों की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है। एक्सचेंज पर होने वाले करेंसी डेरिवेटिव पर भी इसी तरह की कटौती लागू होगी।
- तेल कंपनियों के लिए डॉलर विंडो: इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल की रोजाना डॉलर जरूरत पूरी करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।
RBI ने अपने बयान में कहा कि इन उपायों का मकसद “बाजार अनुशासन मजबूत करना और विदेशी मुद्रा बाजार में उचित जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करना” है, ताकि बाजार व्यवस्थित और पारदर्शी बना रहे।
बाजार पर क्या असर होगा
डीबीएस बैंक के ट्रेजरी प्रमुख आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि ये उपाय खासकर आयातकों की ओर से आने वाली सट्टा डॉलर मांग पर लगाम लगाने के लिए हैं। उनके मुताबिक, 20 फीसदी की FERR, तेल कंपनियों की डॉलर मांग को बाजार से अलग करना और सीमा घटाकर 50 लाख डॉलर करना, तीनों मिलकर डॉलर की मांग घटाएंगे और रुपये को सहारा देंगे।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ बैंकरों का कहना है कि 20 फीसदी की इस शर्त से बड़े आयातकों के लिए हेजिंग बहुत महंगी हो जाएगी। कुछ ने यह आशंका भी जताई है कि इतनी सख्ती से बाजार की गतिविधि घट सकती है और रुपये का बाजार-आधारित मूल्य बिगड़ सकता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, ये 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ के बाद RBI के सबसे मजबूत कदमों में से हैं। विश्लेषकों को उम्मीद है कि सोमवार को बाजार खुलने पर रुपये में तेजी दिख सकती है और RBI 97 प्रति डॉलर के स्तर का बचाव करेगा। हालांकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच यह बढ़त टिकाए रखना आसान नहीं होगा। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले कह चुके हैं कि कुछ पैमानों पर रुपया अपने वास्तविक मूल्य से कम आंका जा रहा है।
दबाव की असली वजहें: तेल, विदेशी बिकवाली और ऊंची ब्याज दरें
रुपये पर दबाव कई मोर्चों से है। इकोनॉमिक टाइम्स के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों (FII) ने अक्टूबर के पहले छह कारोबारी सत्रों में ही 45,125 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बेच दिए हैं, जो पूरे सितंबर की 45,536 करोड़ रुपये की निकासी के लगभग बराबर है। बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, इस साल विदेशी फंड भारतीय शेयरों से 30 अरब डॉलर से ज्यादा निकाल चुके हैं।
अमेरिका में 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.3 फीसदी के पार पहुंच चुकी है, जिससे दुनिया भर का पैसा अमेरिकी बॉन्ड की ओर जा रहा है। वहीं ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए महंगा तेल सीधे डॉलर की मांग बढ़ाता है। यही वजह है कि तेल कंपनियों के लिए अलग डॉलर खिड़की को अहम माना जा रहा है।
RBI ने बुधवार को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 फीसदी कर दिया था। बिजनेस टुडे के मुताबिक, यह करीब चार साल में पहली दरवृद्धि है। इसके बावजूद शेयर बाजार ने पिछले हफ्ते कुछ राहत दिखाई और निफ्टी 0.4 फीसदी की साप्ताहिक बढ़त के साथ 22,520.45 पर बंद हुआ, जिससे आठ हफ्तों से जारी गिरावट का सिलसिला टूटा।
आम आदमी के लिए इसका मतलब
कमजोर रुपया आम लोगों की जेब पर सीधा असर डालता है। विदेश में पढ़ाई, विदेश यात्रा, इलेक्ट्रॉनिक सामान और आयातित वस्तुएं महंगी होती हैं, और पेट्रोल-डीजल की लागत पर भी दबाव बढ़ता है। ऐसे में रुपये का स्थिर होना महंगाई पर काबू के लिए भी जरूरी है।
अब बाजार की नजर सोमवार पर है, जब रुपये का कारोबार फिर शुरू होगा और सितंबर के खुदरा महंगाई (CPI) के आंकड़े भी आने हैं। RBI के ये कदम कितने कारगर होंगे, यह काफी हद तक कच्चे तेल की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक ने साफ संदेश दे दिया है कि वह रुपये को बेलगाम गिरने नहीं देगा।
मुंबई: डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहे रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शनिवार को बड़ा और सख्त कदम उठाया। रुपये में गिरावट रोकने के लिए केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव बाजार के नियम कड़े कर दिए हैं और सरकारी तेल कंपनियों के लिए डॉलर की अलग खिड़की खोल दी है। बाजार के जानकार इसे हाल के वर्षों में रुपये के बचाव के लिए उठाए गए सबसे मजबूत कदमों में गिन रहे हैं।
द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जो उसके अब तक के सबसे निचले बंद स्तर 96.82 के बेहद करीब है। इस साल रुपया करीब 7 फीसदी टूट चुका है और एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन वाली मुद्राओं में शामिल है।
रुपये में गिरावट रोकने के लिए RBI के नए नियम
RBI ने जो कदम उठाए हैं, उनका सीधा निशाना सट्टेबाजी वाली डॉलर मांग है। रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य बदलाव ये हैं:
- फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR): 20 लाख डॉलर से ज्यादा के हर फॉरेक्स डेरिवेटिव सौदे पर बैंकों को उसकी नोशनल वैल्यू के 20 फीसदी के बराबर रकम रुपये में RBI के पास रखनी होगी।
- दोबारा बुकिंग पर रोक: निर्देश जारी होने के बाद किसी भी बैंक के साथ रद्द किए गए रुपये से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक नहीं किया जा सकेगा। हालांकि मैच्योरिटी पर रोलओवर की छूट बनी रहेगी।
- सीमा में भारी कटौती: बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर साबित किए होने वाले फॉरेक्स डेरिवेटिव सौदों की सीमा 10 करोड़ डॉलर से घटाकर 50 लाख डॉलर कर दी गई है। एक्सचेंज पर होने वाले करेंसी डेरिवेटिव पर भी इसी तरह की कटौती लागू होगी।
- तेल कंपनियों के लिए डॉलर विंडो: इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल की रोजाना डॉलर जरूरत पूरी करने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।
RBI ने अपने बयान में कहा कि इन उपायों का मकसद “बाजार अनुशासन मजबूत करना और विदेशी मुद्रा बाजार में उचित जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करना” है, ताकि बाजार व्यवस्थित और पारदर्शी बना रहे।
बाजार पर क्या असर होगा
डीबीएस बैंक के ट्रेजरी प्रमुख आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि ये उपाय खासकर आयातकों की ओर से आने वाली सट्टा डॉलर मांग पर लगाम लगाने के लिए हैं। उनके मुताबिक, 20 फीसदी की FERR, तेल कंपनियों की डॉलर मांग को बाजार से अलग करना और सीमा घटाकर 50 लाख डॉलर करना, तीनों मिलकर डॉलर की मांग घटाएंगे और रुपये को सहारा देंगे।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ बैंकरों का कहना है कि 20 फीसदी की इस शर्त से बड़े आयातकों के लिए हेजिंग बहुत महंगी हो जाएगी। कुछ ने यह आशंका भी जताई है कि इतनी सख्ती से बाजार की गतिविधि घट सकती है और रुपये का बाजार-आधारित मूल्य बिगड़ सकता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, ये 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ के बाद RBI के सबसे मजबूत कदमों में से हैं। विश्लेषकों को उम्मीद है कि सोमवार को बाजार खुलने पर रुपये में तेजी दिख सकती है और RBI 97 प्रति डॉलर के स्तर का बचाव करेगा। हालांकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच यह बढ़त टिकाए रखना आसान नहीं होगा। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा पहले कह चुके हैं कि कुछ पैमानों पर रुपया अपने वास्तविक मूल्य से कम आंका जा रहा है।
दबाव की असली वजहें: तेल, विदेशी बिकवाली और ऊंची ब्याज दरें
रुपये पर दबाव कई मोर्चों से है। इकोनॉमिक टाइम्स के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों (FII) ने अक्टूबर के पहले छह कारोबारी सत्रों में ही 45,125 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बेच दिए हैं, जो पूरे सितंबर की 45,536 करोड़ रुपये की निकासी के लगभग बराबर है। बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, इस साल विदेशी फंड भारतीय शेयरों से 30 अरब डॉलर से ज्यादा निकाल चुके हैं।
अमेरिका में 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5.3 फीसदी के पार पहुंच चुकी है, जिससे दुनिया भर का पैसा अमेरिकी बॉन्ड की ओर जा रहा है। वहीं ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए महंगा तेल सीधे डॉलर की मांग बढ़ाता है। यही वजह है कि तेल कंपनियों के लिए अलग डॉलर खिड़की को अहम माना जा रहा है।
RBI ने बुधवार को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.5 फीसदी कर दिया था। बिजनेस टुडे के मुताबिक, यह करीब चार साल में पहली दरवृद्धि है। इसके बावजूद शेयर बाजार ने पिछले हफ्ते कुछ राहत दिखाई और निफ्टी 0.4 फीसदी की साप्ताहिक बढ़त के साथ 22,520.45 पर बंद हुआ, जिससे आठ हफ्तों से जारी गिरावट का सिलसिला टूटा।
आम आदमी के लिए इसका मतलब
कमजोर रुपया आम लोगों की जेब पर सीधा असर डालता है। विदेश में पढ़ाई, विदेश यात्रा, इलेक्ट्रॉनिक सामान और आयातित वस्तुएं महंगी होती हैं, और पेट्रोल-डीजल की लागत पर भी दबाव बढ़ता है। ऐसे में रुपये का स्थिर होना महंगाई पर काबू के लिए भी जरूरी है।
अब बाजार की नजर सोमवार पर है, जब रुपये का कारोबार फिर शुरू होगा और सितंबर के खुदरा महंगाई (CPI) के आंकड़े भी आने हैं। RBI के ये कदम कितने कारगर होंगे, यह काफी हद तक कच्चे तेल की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक ने साफ संदेश दे दिया है कि वह रुपये को बेलगाम गिरने नहीं देगा।
























































