अक्टूबर 26, 2026
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Karnataka Voter List: 61 हजार नाम हटाने की अर्जी खुद अफसरों ने दी, वजह खाली

Bengaluru polling booth voters queue, file photo

Karnataka Voter List: कर्नाटक की मतदाता सूची से नाम हटाने की हजारों अर्जियों में आपत्ति करने वाला कोई आम नागरिक या पार्टी कार्यकर्ता नहीं, बल्कि खुद चुनाव अधिकारी हैं। अंग्रेजी अखबार द हिंदू की पड़ताल के मुताबिक कम से कम 61,059 Form-7 अर्जियां इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और असिस्टेंट ERO (AERO) के नाम से दाखिल हुईं, और इनमें से एक में भी नाम हटाने की वजह नहीं लिखी गई। रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत यह वजह बताना अनिवार्य है।

बेंगलुरु दक्षिण के एक मतदान केंद्र के बाहर कतार में खड़े मतदाता, कर्नाटक मतदाता सूची Form-7 विवाद
बेंगलुरु दक्षिण के एक मतदान केंद्र पर कतार में मतदाता (फाइल फोटो, 2008 विधानसभा चुनाव, प्रतीकात्मक)। फोटो: PIB, Wikimedia Commons (GODL-India)

यह रिपोर्ट 26 अक्टूबर को द हिंदू में ऋषिता खन्ना और पोन वसंत बी.ए. की बाइलाइन से छपी है। इसमें सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जो तंत्र किसी वोटर के नाम पर आपत्ति दर्ज कर रहा है, वही तंत्र यह भी तय कर रहा है कि वह नाम सूची में रहेगा या कटेगा। कर्नाटक की अंतिम मतदाता सूची 27 अक्टूबर को प्रकाशित होनी है।

अफसरों की सफाई: ‘सिस्टम ने अपने-आप बनाए फॉर्म’

द हिंदू के मुताबिक जिन ERO और AERO के नाम इन अर्जियों में आपत्तिकर्ता के तौर पर दर्ज हैं, उनका कहना है कि ये फॉर्म सिस्टम ने उनके डिजिटल हस्ताक्षर के साथ “ऑटो-जेनरेट” किए। ऐसा उन मामलों में हुआ, जहां ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (ब्योरे में तार्किक गड़बड़ी) के नोटिस पर सुनवाई के दौरान वोटर से संपर्क नहीं हो सका और उसे ‘अयोग्य’ मान लिया गया।

अधिकारियों ने अखबार को बताया कि उन्हें निर्देश थे कि वोटर अगर कहीं और चला गया हो, उसका नाम दो जगह दर्ज हो, वह नाबालिग हो, उसकी मौत हो चुकी हो या वह भारतीय नागरिक न हो, तो Form-7 भरा जाए। लेकिन फॉर्म अपने-आप बनने की वजह से ‘कारण’ वाला खाना खाली रह गया। नतीजा यह कि न वोटर और न ही सूची की जांच करने वाला कोई और यह जान सकता है कि किसी खास नाम को हटाने के लिए क्यों चिह्नित किया गया।

रिपोर्ट यह भी याद दिलाती है कि इन्हीं श्रेणियों के वोटरों, यानी ASDD (अनुपस्थित, स्थानांतरित, डुप्लिकेट, मृत) और अन्य की जांच स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के गणना चरण में पहले ही हो चुकी थी। उसी चरण में कर्नाटक की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 1.07 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए थे, जिनमें सबसे ज्यादा स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने के आधार पर हटे।

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डेडलाइन खत्म, फिर भी बरसे 60 हजार फॉर्म

द हिंदू के आंकड़ों के मुताबिक दावे और आपत्तियों की अवधि 23 सितंबर 2026 को खत्म हुई थी। 24 अगस्त से 23 सितंबर के बीच अधिकारियों के नाम से सिर्फ 192 ऐसी अर्जियां आई थीं। लेकिन 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच यह संख्या 60,800 से ज्यादा हो गई।

निपटारे की आखिरी तारीख 22 अक्टूबर को एक ही दिन में 10,105 Form-7 दाखिल हुए। उससे एक दिन पहले 21 अक्टूबर को 10,314, जबकि 17 और 19 अक्टूबर को क्रमश: 11,132 और 11,760 अर्जियां दाखिल हुईं।

अखबार ने कई ऐसे वोटरों के EPIC नंबर लेकर चुनाव आयोग के पोर्टल पर जांच की, जिनके खिलाफ अधिकारियों ने Form-7 दाखिल किया था। जितने मामले जांचे गए, सभी में नाम पहले ही सूची से हट चुके थे, उनमें भी जिनकी अर्जी 23 सितंबर के बाद आई थी। नियम के मुताबिक तय अवधि के बाद आई अर्जियों पर अंतिम सूची के लिए नहीं, बल्कि SIR के बाद आने वाली पूरक सूची के लिए विचार होना था।

नियम क्या कहते हैं, और सवाल कहां खड़े हैं

रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 का नियम 17 कहता है कि जो दावा या आपत्ति तय अवधि में या तय फॉर्म और तरीके से दाखिल न हो, उसे रजिस्ट्रेशन ऑफिसर “खारिज करेगा”। द हिंदू के मुताबिक यह भी साफ नहीं है कि इन मामलों में नाम हटाने से पहले जरूरी सुनवाई के नोटिस या आदेश जारी हुए या नहीं, क्योंकि संबंधित ब्योरे खाली छोड़े गए हैं।

इससे पहले 15 अक्टूबर को द हिंदू ने रिपोर्ट किया था कि कई राज्यों में चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ERONet ने SIR सुनवाई के दौरान नाम हटाए जाने पर ERO के डिजिटल हस्ताक्षर वाले Form-7 अपने-आप बनाए, लेकिन इसके लिए आयोग ने राज्यों को कोई लिखित SOP नहीं दी थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक इलेक्टोरल रोल्स मैनुअल, 2024 में ERO के खुद Form-7 दाखिल करने का प्रावधान नहीं है; ERO फैसला करने वाला अधिकारी है, जो अयोग्य पाए गए नाम को हटा सकता है। उस वक्त आयोग ने अखबार के सवाल का जवाब नहीं दिया था।

सबसे ज्यादा मामले बेंगलुरु में

बेंगलुरु के एक मतदान केंद्र पर अपने वोटर पहचान पत्र (EPIC) दिखाती युवा मतदाता
बेंगलुरु के एक मतदान केंद्र पर वोटर आईडी (EPIC) दिखाती मतदाता (फाइल फोटो, 2014 लोकसभा चुनाव, प्रतीकात्मक)। फोटो: PIB, Wikimedia Commons (GODL-India)

ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिके (BBMP) साउथ जिले में अधिकारियों ने सबसे ज्यादा Form-7 दाखिल किए। यहां कुल 17,491 अर्जियों में से 10,374 अधिकारियों के नाम से थीं, यानी वोटरों या तीसरे पक्ष से ज्यादा। अकेले बोम्मनहल्ली विधानसभा क्षेत्र में 5,757 में से 4,095 अर्जियां अधिकारियों ने दाखिल कीं। द हिंदू के मुताबिक कम से कम 26 विधानसभा क्षेत्रों में यही पैटर्न दिखा।

अखबार का कहना है कि असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है, क्योंकि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर Form-10 के समेकित रिकॉर्ड में दिखने वाली Form-7 अर्जियां लगातार राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के बयानों से कम रही हैं। 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच CEO दफ्तर ने 1,70,442 Form-7 बताए, जबकि आयोग की वेबसाइट पर सिर्फ 1,56,634 उपलब्ध थे, यानी 13,808 का अंतर।

चुनाव आयोग का पक्ष क्या रहा है

द हिंदू की इस ताजा रिपोर्ट पर कर्नाटक CEO या चुनाव आयोग का कोई जवाब रिपोर्ट में दर्ज नहीं है, और खबर लिखे जाने तक हमें कोई सार्वजनिक बयान नहीं मिला। इससे पहले, थोक में दाखिल Form-7 के विवाद के बीच 5 अक्टूबर को कर्नाटक के CEO वी. अंबुकुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सिर्फ Form-7 मिलने से किसी का नाम नहीं कटता। द हिंदू के मुताबिक उन्होंने कहा था, “नोटिस दिया जाएगा, सुनवाई होगी, और उसके बाद ही जरूरत पड़ने पर नाम हटेगा।” 16 अक्टूबर की एक प्रेस रिलीज में CEO दफ्तर ने यह भी बताया था कि पता बदलने की हर Form-8 अर्जी के साथ एक Form-7 अपने-आप बनता है।

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यूपी में भी जांच के घेरे में फॉर्म

मतदाता सूची में गड़बड़ी के सवाल सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने पीलीभीत और आजमगढ़ की सूचियों में गड़बड़ियां सामने आने के बाद 10 अप्रैल (SIR खत्म होने) से 24 अक्टूबर तक कंप्यूटर असिस्टेंट द्वारा दर्ज सभी Form-6, 7 और 8 की जांच के आदेश दिए हैं। इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के मुताबिक अब कागजी फॉर्म की एंट्री कंप्यूटर असिस्टेंट नहीं करेंगे, बल्कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) उन्हें BLO ऐप से डिजिटाइज करेंगे। गड़बड़ी दोहराने पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

आप क्या करें: अपना नाम ऐसे जांचें

अगर आप कर्नाटक या किसी और राज्य के वोटर हैं, तो अपना नाम चुनाव आयोग की वेबसाइट electoralsearch.eci.gov.in पर EPIC नंबर, अपने ब्योरे या मोबाइल नंबर से खोज सकते हैं। यही सुविधा Voter Helpline App पर भी है, और मदद के लिए टोल-फ्री नंबर 1950 पर कॉल किया जा सकता है।

चुनाव आयोग के मुताबिक जिनका नाम सूची में नहीं है, वे voters.eci.gov.in पर Form-6 भरकर नए वोटर के तौर पर नाम जुड़वाने का आवेदन कर सकते हैं। यह फॉर्म ERO, AERO और BLO के दफ्तरों में मुफ्त भी मिलता है। पता बदलने या ब्योरा सुधारने के लिए Form-8 है। कर्नाटक में तय अवधि के बाद आई अर्जियों पर SIR के बाद आने वाली पूरक सूची में विचार होना है, इसलिए 27 अक्टूबर को अंतिम सूची आने के बाद अपना नाम जरूर जांच लें।

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