अक्टूबर 26, 2026
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Israel Election: आखिरी सर्वे में नेतन्याहू-आइजनकोट दोनों बहुमत से दूर

गादी आइजनकोट, इजराइल विपक्ष के नेता, यशर पार्टी

Israel Election: इजराइल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को संसद यानी नेसेट (Knesset) की सभी 120 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे, और मतदान से ठीक पहले की तस्वीर साफ नहीं, उलझी हुई है। आखिरी सर्वे के मुताबिक न प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का खेमा सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों तक पहुंचता दिख रहा है, न ही पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट की अगुवाई वाला विपक्षी खेमा। साफ कर दें कि ये नतीजे या एग्जिट पोल नहीं, बल्कि मतदान से पहले के ओपिनियन पोल हैं। असली गिनती मंगलवार रात से शुरू होगी।

इजराइल की यशर पार्टी के प्रमुख और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट नीली पृष्ठभूमि में गहरे नीले सूट में
यशर पार्टी के प्रमुख और इजराइली सेना के पूर्व प्रमुख गादी आइजनकोट (फाइल फोटो, जून 2026)। फोटो: Yahav Trudler / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

इजराइल के केंद्रीय चुनाव आयोग (Central Elections Committee) ने रविवार को बताया कि करीब 73 लाख लोग वोट डालने के पात्र हैं। देशभर में 12,018 मतदान केंद्रों पर 18,000 मतपेटियां रखी जाएंगी और करीब एक लाख कर्मचारी ड्यूटी पर होंगे। ज्यादातर केंद्रों पर वोटिंग इजराइली समय के मुताबिक सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक होगी, यानी भारतीय समय से मंगलवार सुबह 10:30 बजे से बुधवार तड़के 1:30 बजे तक।

आखिरी सर्वे क्या कहते हैं

इजराइल में मतदान से तीन दिन पहले नए सर्वे छापने पर रोक लग जाती है, इसलिए शुक्रवार को आए सर्वे आखिरी थे। टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक चैनल 13 के सर्वे में नेतन्याहू विरोधी “चेंज ब्लॉक” को 54 और नेतन्याहू समर्थक खेमे को 50 सीटें मिलती दिखीं, जबकि अरब पार्टियों को 16। चैनल 12 ने चेंज ब्लॉक को 56, सत्ताधारी गठबंधन को 50 और अरब पार्टियों (जॉइंट लिस्ट और राम) को 14 सीटें दीं। सरकारी प्रसारक Kan के सर्वे में यह आंकड़ा 52 बनाम 50 रहा, अरब पार्टियों को 14 और योआज हेंडल की रिजर्विस्ट्स पार्टी को 4 सीटें मिलती दिखीं।

पार्टियों के हिसाब से चैनल 13, चैनल 12 और Kan, तीनों ने आइजनकोट की नई पार्टी यशर (Yashar) को सबसे बड़ी पार्टी बताया है, जिसे 22 से 23 सीटें मिलती दिख रही हैं। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 19 से 21 सीटों पर है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट की पार्टी बेयाखद (टुगेदर) को 14 से 15 सीटें मिलने का अनुमान है। लेकिन सभी सर्वे एक जैसे नहीं हैं। i24NEWS के लिए Direct Polls के सर्वे ने नेतन्याहू खेमे को 59 सीटें दीं, यानी बहुमत से सिर्फ दो कम, और लिकुड को 26 सीटों के साथ सबसे आगे रखा। इसी सर्वे में आइजनकोट खेमे को 47 सीटें मिलीं।

इस अंतर की बड़ी वजह छोटी पार्टियां हैं। नेसेट में पहुंचने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25% वोट चाहिए। पूर्व जनरल ओफर विंटर की पार्टी को i24NEWS ने 4 सीटें दीं, जबकि Kan के सर्वे में वह 2.9% पर अटक गई। जो पार्टी यह सीमा पार नहीं करती, उसके सारे वोट बेकार हो जाते हैं, और यही एक-दो सीटें पूरा गणित बदल सकती हैं। Kan के सर्वे में 36% लोगों ने कहा कि उन्होंने अभी तय नहीं किया है कि किसे वोट देंगे।

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नेतन्याहू और आइजनकोट ने आखिरी दौर में क्या कहा

रविवार को तेल अवीव में अपनी आखिरी बड़ी रैली में आइजनकोट ने कहा, “मैं सर्वे देखता हूं, आंकड़े जानता हूं और नेतन्याहू को जानता हूं। सत्ता में बने रहने के लिए वे कुछ भी करने से नहीं रुकेंगे, न कोई झूठ, न कोई अतिवादी कदम।” टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक उन्होंने लिकुड समर्थकों से भी पाला बदलने की अपील की और कहा कि नेतन्याहू को हटाने के लिए यशर को लिकुड से काफी ज्यादा सीटें जीतनी होंगी। समाचार एजेंसी AFP के मुताबिक आइजनकोट ने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले से जुड़ी चूकों की जांच के लिए सरकारी जांच आयोग बनाने का वादा किया है।

इजराइल के नेशेर में सड़क किनारे लगा लिकुड पार्टी का चुनावी होर्डिंग, जिस पर नेतन्याहू और विपक्षी नेताओं की तस्वीरें हैं
नेशेर में लिकुड का चुनावी होर्डिंग, जिस पर हिब्रू में लिखा है- ‘दक्षिणपंथ या फिलिस्तीन’ (18 अक्टूबर 2026)। फोटो: Hanay / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

नेतन्याहू ने अपना पूरा अभियान सुरक्षा और ईरान के इर्द-गिर्द रखा है। AFP के मुताबिक रविवार को चैनल 14 पर उन्होंने कहा कि विरोधी “फिलिस्तीनी राष्ट्र बनाना चाहते हैं, जो इजराइल के लिए तबाही होगी।” उन्होंने कहा, “वे ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म नहीं करेंगे। हमने 90% काम कर दिया है, 10% बाकी है। यह कौन करेगा? सिर्फ मैं कर सकता हूं।” AFP के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस चुनाव में नेतन्याहू का समर्थन किया है। आइजनकोट ने खुद को फिलिस्तीनी राष्ट्र के खिलाफ बताया है। नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमा भी चल रहा है, जिनमें वे आरोपों से इनकार करते हैं।

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61 का जादुई आंकड़ा और आगे का रास्ता

इजराइल में किसी एक पार्टी को कभी अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है, इसलिए हर बार सरकार गठबंधन से बनती है। चुनाव के बाद राष्ट्रपति पार्टियों से सलाह करके उस सांसद को सरकार बनाने का मौका देते हैं, जिसके बारे में माना जाए कि वह 61 सांसदों का समर्थन जुटा सकता है। यह जरूरी नहीं कि सबसे बड़ी पार्टी के नेता को ही पहला मौका मिले। इसी वजह से आइजनकोट चाहते हैं कि यशर की बढ़त बड़ी हो।

अगर दोनों खेमे 61 से पीछे रहे तो अरब पार्टियां और छोटे दल अहम हो जाएंगे। राम पार्टी के प्रमुख मंसूर अब्बास कह चुके हैं कि वे चेंज ब्लॉक की सरकार में शामिल होने को तैयार हैं, लेकिन टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक उस खेमे की कई पार्टियां उनके साथ बैठने से इनकार कर चुकी हैं। Kan के सर्वे में जब पूछा गया कि आइजनकोट खेमा आगे रहे पर 61 तक न पहुंचे तो क्या हो, तो 27% ने एकता सरकार, 27% ने दोबारा चुनाव और 26% ने अल्पमत सरकार को चुना। वोटिंग खत्म होते ही चैनल 12, 13 और Kan अपने एग्जिट पोल जारी करेंगे, लेकिन असली तस्वीर केंद्रीय चुनाव आयोग की गिनती से ही साफ होगी।

भारत के लिए क्यों मायने रखता है यह चुनाव

भारत और इजराइल के रिश्ते पिछले कुछ सालों में किसी एक नेता से आगे बढ़कर संस्थागत हो चुके हैं, लेकिन नेतन्याहू के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी केमिस्ट्री भी किसी से छिपी नहीं है। इसी साल 25-26 फरवरी को मोदी राजकीय यात्रा पर इजराइल गए थे और नेसेट को संबोधित किया था। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक तब दोनों देशों ने रिश्तों को “स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फॉर पीस, इनोवेशन एंड प्रॉस्पेरिटी” का दर्जा दिया और मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को जल्द पूरा करने पर जोर दिया।

इजराइल में भारत और इजराइल के बीच समझौता ज्ञापनों के आदान-प्रदान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू
26 फरवरी 2026 को इजराइल में भारत-इजराइल समझौतों के आदान-प्रदान के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू (फाइल फोटो)। फोटो: PMO / Wikimedia Commons (GODL-India)

दोनों देश रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और AI जैसे क्षेत्रों के साथ IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) पर भी साथ काम कर रहे हैं। FTA पर बातचीत के दो दौर फरवरी और जुलाई 2026 में हो चुके हैं, और भारत में इजराइल के राजदूत रूवेन अजार के मुताबिक समझौता फरवरी 2027 तक आकार ले सकता है। ऐसे में यरुशलम में सरकार किसकी बनती है और कितनी जल्दी बनती है, इसका असर इन बातचीतों की रफ्तार पर पड़ सकता है। अगर मामला लंबी गठबंधन खींचतान या दोबारा चुनाव तक गया, तो फैसले टल भी सकते हैं।

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