The Economist की Modi पर सलाह, भारतीयों ने आंकड़ों से दिया करारा जवाब

लंदन से सलाह आई: ‘मोदी को रिफ्रेश की जरूरत है।’ भारत से जवाब आया आंकड़ों में: ब्रिटेन 1.3%, भारत 7%।
ब्रिटिश पत्रिका The Economist ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 साल (पहले गुजरात के मुख्यमंत्री, फिर प्रधानमंत्री) पर लीडर लेख और लंबी ब्रीफिंग छापी। सोमवार, 2 नवंबर को पत्रिका ने लेख की सबसे तीखी लाइन X पर पोस्ट की, और भारतीय सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई।

The Economist ने क्या लिखा
29 अक्टूबर के लीडर लेख का शीर्षक है ‘What to make of 25 years of Narendra Modi’। पत्रिका की अपनी पोस्ट्स के मुताबिक इसके मुख्य तर्क ये हैं:
- नौकरियों पर सवाल: ‘तेज आर्थिक विकास भी वोटरों को संतुष्ट नहीं करेगा, अगर उससे नौकरियां पैदा न हों।’
- रिफ्रेश की सलाह: ‘मजबूत विरोधी पार्टी या BJP के अंदर कोई चुनौती देने वाला न होने से प्रधानमंत्री अपनी सरकार में बदलाव के गंभीर संकेत नहीं दिखा रहे। देश को आगे बढ़ने के लिए ज्यादा साहसी सोच चाहिए।’
- सुधारों पर: सर्विस इकोनॉमी के भरोसे आगे बढ़ने के लिए भारत को ऐसे बदलाव चाहिए जो मोदी अब तक नहीं ला पाए।
साथ छपी ब्रीफिंग ‘Narendra Modi and the battle for India’ में पत्रिका ने और कड़ी बात लिखी: मोदी ने ‘किसी भी दूसरे भारतीय नेता से ज्यादा सख्ती से’ सत्ता का इस्तेमाल किया, ‘फिर भी भारतीय लोकतंत्र उतना कमजोर नहीं जितना कई लोग मानते हैं।’ पत्रिका ने यह भी माना कि 25 साल में मोदी ‘गजब के लचीले’ साबित हुए हैं और ‘बिना लड़े हार नहीं मानेंगे।’
जवाब नंबर 1: IMF का 7%
भारतीय यूजर्स ने सबसे पहले IMF का ताजा वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (अक्टूबर 2026) आगे रखा। IMF के मुताबिक भारत की GDP ग्रोथ 2026 और 2027 दोनों में 7% रहने का अनुमान है, जो अप्रैल के अनुमान से 0.5 प्रतिशत अंक ज्यादा है। तुलना कीजिए:
- भारत: 7.0%
- चीन: 4.5%
- अमेरिका: 2.3%
- ब्रिटेन: 1.3%
- जर्मनी: 1.3%
- जापान: 0.7%
- फ्रांस: 0.4%
जवाब नंबर 2: 27 करोड़ लोग गरीबी से बाहर
दूसरा हथियार बना वर्ल्ड बैंक का डेटा। उसकी पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ के मुताबिक भारत में अत्यधिक गरीबी (3 डॉलर प्रतिदिन की रेखा) 2011-12 के 27.1% से घटकर 2022-23 में 5.3% रह गई। यानी करीब 26.9 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकले।
ध्यान रहे: सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ‘50 करोड़ लोग गरीबी से बाहर’ का दावा कर रहे हैं, लेकिन वर्ल्ड बैंक का आंकड़ा करीब 27 करोड़ का है।
‘लेक्चर देना है तो घर से शुरू कीजिए’
सबसे तीखी प्रतिक्रिया पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल की रही। उन्होंने ‘He is learning’ वाली भाषा को ‘संरक्षक जैसी’ बताया और लिखा: ‘मोदी 140 करोड़ लोगों का देश चला रहे हैं… The Economist सिर्फ एक पत्रिका चला रहा है। अगर उसे दूसरों को सबक देने हैं तो घर से शुरुआत क्यों नहीं करता? ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था मुश्किल में क्यों है?’
हालांकि बहस एकतरफा नहीं रही। कुछ यूजर्स ने पत्रिका से सहमति जताते हुए नौकरियों और नौकरशाही पर सवाल उठाए, तो कुछ ने कहा कि BJP में नेतृत्व का फैसला RSS करता है, इसलिए ‘अंदरूनी चुनौती’ वाला तर्क लागू नहीं होता। पत्रिका के अपने पॉडकास्ट ‘The Intelligence’ में भी माना गया कि मोदी के दौर में डिजिटल पेमेंट, GST और औसतन करीब 6% सालाना ग्रोथ बड़ी कामयाबियां रहीं, जबकि मैन्युफैक्चरिंग नौकरियां और ग्रेजुएट्स का रोजगार कमजोर कड़ी।
असली सवाल
आंकड़े दोनों तरफ हैं: दुनिया की सबसे तेज बड़ी अर्थव्यवस्था और गरीबी में ऐतिहासिक गिरावट एक तरफ, युवाओं के लिए अच्छी नौकरियों की चुनौती दूसरी तरफ। The Economist की सलाह पर सरकार या BJP की ओर से खबर लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई थी।
यह खबर The Economist के 29 अक्टूबर के लीडर लेख और ब्रीफिंग (पत्रिका की आधिकारिक X/Bluesky पोस्ट्स और पॉडकास्ट), IMF के अक्टूबर 2026 वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक, वर्ल्ड बैंक की भारत पॉवर्टी ब्रीफ और कंवल सिब्बल की X पोस्ट पर आधारित है।






