अक्टूबर 30, 2026
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Ahoi Ashtami 2026 Kab Hai: 1 नवंबर को व्रत, आपके शहर में कब दिखेंगे तारे?

अहोई अष्टमी 2026: अहोई अष्टमी पूजन के लिए दीवार पर बनाया गया अहोई माता का चित्र, साथ में बच्चों की आकृतियां और स्याहू

Ahoi Ashtami 2026 Kab Hai: संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इस बार रविवार, 1 नवंबर 2026 को है। द्रिक पंचांग के मुताबिक नई दिल्ली में अहोई माता की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक रहेगा, यानी पूजा के लिए करीब 1 घंटा 18 मिनट मिलेंगे। व्रत खोलने के लिए जिन तारों का इंतजार होता है, वे दिल्ली में शाम करीब 6 बजे दिखने लगेंगे।

Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी पूजन के लिए दीवार पर बनाया गया अहोई माता का चित्र, साथ में बच्चों की आकृतियां और स्याहू
अहोई अष्टमी पूजन के लिए बनाया गया अहोई माता का चित्र (फाइल फोटो, 2017)। फोटो: आशीष भटनागर / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

करवा चौथ के ठीक बाद आने वाला यह व्रत उत्तर भारत के घरों में खास अहमियत रखता है। कई जगह इसे अहोई आठें भी कहा जाता है, क्योंकि यह कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि, यानी अष्टमी को पड़ता है। इस साल यह दिवाली (8 नवंबर) से ठीक एक हफ्ता पहले आ रहा है।

1 नवंबर या 2 नवंबर, सही तारीख क्या है?

इस बार तारीख को लेकर थोड़ी उलझन इसलिए है, क्योंकि अष्टमी तिथि दो दिन में बंटी है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2:51 बजे शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे खत्म हो जाएगी।

अहोई माता की पूजा और तारों को अर्घ्य शाम के वक्त दिया जाता है। 1 नवंबर की शाम अष्टमी तिथि मौजूद रहेगी, जबकि 2 नवंबर की शाम तक नवमी लग चुकी होगी। यही वजह है कि पंचांग के जानकार 1 नवंबर, रविवार को ही व्रत रखने की सलाह दे रहे हैं। मथुरा में गोवर्धन के राधा कुंड स्नान की परंपरा भी पंचांग में इसी दिन दर्ज है।

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आपके शहर में पूजा मुहूर्त और तारे दिखने का समय

सूर्यास्त का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पूजा मुहूर्त और तारे दिखने का समय भी बदल जाता है। पूर्व के शहरों में शाम जल्दी होती है, तो कोलकाता और पटना में पूजा सबसे पहले शुरू हो जाएगी, जबकि मुंबई और अहमदाबाद में सबसे देर से। नीचे दिया गया समय द्रिक पंचांग के शहरवार आंकड़ों पर आधारित है (सभी समय 1 नवंबर की शाम के)।

शहरपूजा मुहूर्ततारे दिखने का समयचंद्रोदय
नई दिल्ली5:36 से 6:54 बजे6:00 बजे11:40 बजे
गुरुग्राम5:37 से 6:55 बजे6:01 बजे11:41 बजे
फरीदाबाद5:36 से 6:54 बजे6:00 बजे11:40 बजे
चंडीगढ़5:35 से 6:53 बजे6:00 बजे11:38 बजे
जयपुर5:44 से 7:01 बजे6:08 बजे11:50 बजे
लखनऊ5:24 से 6:41 बजे5:48 बजे11:28 बजे
वाराणसी5:17 से 6:34 बजे5:41 बजे11:22 बजे
पटना5:08 से 6:25 बजे5:32 बजे11:13 बजे
भोपाल5:42 से 6:59 बजे6:05 बजे11:49 बजे
कोलकाता4:59 से 6:15 बजे5:22 बजे11:05 बजे
अहमदाबाद6:02 से 7:18 बजे6:25 बजेरात 12:10 बजे (2 नवंबर)
मुंबई6:05 से 7:20 बजे6:28 बजेरात 12:15 बजे (2 नवंबर)
पुणे6:02 से 7:17 बजे6:24 बजेरात 12:12 बजे (2 नवंबर)
बेंगलुरु5:53 से 7:07 बजे6:15 बजेरात 12:06 बजे (2 नवंबर)

तारे दिखने का समय मौसम पर भी निर्भर करता है। बादल या धुंध हो तो तारे देर से नजर आ सकते हैं। ऐसे में ज्यादातर परिवार मुहूर्त के भीतर पूजा करके आसमान साफ होने का इंतजार करते हैं। जो सूची में नहीं है, वे अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग से मिला लें।

तारे देखकर या चांद देखकर, कब खुलेगा व्रत?

अहोई अष्टमी पर ज्यादातर महिलाएं सुबह से शाम तक निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को तारे देखकर उन्हें अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। कुछ परिवारों में चांद देखकर व्रत खोलने की परंपरा भी है, लेकिन इस दिन चांद काफी देर से निकलता है। दिल्ली में 1 नवंबर को चंद्रोदय रात 11:40 बजे होगा, जबकि मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और बेंगलुरु में चांद आधी रात के बाद, यानी 2 नवंबर की तारीख लगने पर दिखेगा।

पहले यह व्रत मुख्य रूप से बेटों के लिए रखा जाता था, लेकिन अब ज्यादातर माताएं इसे बेटे और बेटी, दोनों की सेहत और लंबी उम्र की कामना के साथ रखती हैं।

अहोई अष्टमी पर पहनी जाने वाली स्याहू माला, लाल धागे में पिरोए चांदी के मोती और दो चौकोर लॉकेट
स्याहू माला, जिसे अहोई अष्टमी माला भी कहते हैं। प्रयागराज (फाइल फोटो)। फोटो: SpeakingArch / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

कैसे होती है अहोई माता की पूजा?

पूजा के लिए दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है या बाजार में मिलने वाला छपा हुआ चित्र लगाया जाता है। चित्र में अहोई माता के साथ स्याहू (साही) और उसके बच्चों की आकृति भी होती है। अलग-अलग इलाकों में तरीका थोड़ा बदल जाता है, लेकिन आम तौर पर पूजा इस क्रम में होती है:

  • सुबह स्नान के बाद संतान की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लें।
  • शाम को मुहूर्त के भीतर अहोई माता के चित्र के सामने कलश में जल भरकर रखें और दीपक जलाएं।
  • रोली, चावल, दूध और भोग अर्पित करें। कई घरों में पूड़ी, हलवा या पुए का भोग लगता है।
  • परिवार की महिलाएं साथ बैठकर अहोई माता की व्रत कथा सुनती या पढ़ती हैं।
  • तारे दिखने पर कलश के जल से उन्हें अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें।

कई परिवारों में इस दिन स्याहू माला पहनने की भी परंपरा है। यह लाल धागे या कलावे में पिरोई गई चांदी की माला होती है, जिसमें अहोई माता या स्याहू की आकृति वाले लॉकेट लगे होते हैं। हर साल परिवार में संतान बढ़ने पर इसमें एक नया मनका या लॉकेट जोड़ने का चलन भी कुछ इलाकों में है।

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अहोई अष्टमी की कथा

प्रचलित कथा के मुताबिक एक साहूकार की पत्नी के सात बेटे थे। दिवाली से पहले घर लीपने के लिए मिट्टी लाने वह जंगल गई और खुदाई करते समय उसकी कुदाल से अनजाने में स्याहू के एक बच्चे की मौत हो गई। इसके बाद एक-एक करके उसके सातों बेटों की मौत हो गई। दुखी होकर उसने अपनी गलती का पश्चाताप किया और अष्टमी के दिन अहोई माता का व्रत रखा। माना जाता है कि अहोई माता की कृपा से उसके बेटे फिर लौट आए। इसी कथा की वजह से पूजा के चित्र में स्याहू और उसके बच्चे बनाए जाते हैं।

त्योहारों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमता। अहोई अष्टमी के एक हफ्ते बाद 8 नवंबर को दिवाली है और उसके बाद 13 नवंबर को नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व शुरू होगा।

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