Two Child Norm: 3 बच्चों वाली सरपंच बचीं, SC बोला- ऐसे कानून अब बेमानी

महाराष्ट्र के अमरावती डिवीजन की एक ग्राम पंचायत की सरपंच का चुनाव सिर्फ इसलिए रद्द कर दिया गया था, क्योंकि उनके तीन बच्चे थे। अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में लागू ‘टू चाइल्ड नॉर्म’ यानी दो बच्चों की शर्त पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। बुधवार, 4 नवंबर को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।
बेंच ने अपने 37 पन्नों के फैसले में लिखा, “हमारी पक्की राय है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर दंड देने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। ऐसे कानूनों की नींव, यानी बढ़ती आबादी का डर, पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों से ढह चुकी है।” कोर्ट ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है, ताकि 2003 के उस फैसले पर दोबारा विचार हो सके जिसने ऐसे कानूनों को सही ठहराया था।

कहानी कहां से शुरू हुई
मामला अमरावती डिवीजन की ककोडा ग्राम पंचायत का है। मंगला भीमराव इंगले 2022 में यहां सरपंच चुनी गई थीं। बाद में पाया गया कि 2014 में उनका तीसरा बच्चा हुआ था, और महाराष्ट्र विलेज पंचायत्स एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दो से ज्यादा बच्चों वाला व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के अयोग्य है। इसी आधार पर उनका चुनाव रद्द कर दिया गया और हाईकोर्ट ने भी यह फैसला बरकरार रखा।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो बेंच ने साफ किया कि उसकी चिंता सिर्फ इस एक केस के कानूनी पेच तक सीमित नहीं है। फैसले के मुताबिक कोर्ट यह देख रहा था कि जिस आधार पर ये कानून बने थे, जब वह आधार ही बदल चुका है, तो क्या ये कानून आज भी जायज हैं? नोटिस जारी करते वक्त कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिससे मंगला इंगले सरपंच बनी रह सकीं। फैसले में कहा गया है कि यह अंतरिम आदेश अपील के निपटारे तक जारी रहेगा।
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3.0 से 1.9 पर आई प्रजनन दर, यही है असली तर्क
2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पंचायती राज एक्ट, 1994 की उस शर्त को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से ज्यादा बच्चों वाले लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते थे। उस वक्त देश में बढ़ती आबादी को बड़ा खतरा माना जा रहा था। अब बेंच का कहना है कि उस फैसले की बुनियाद ही बदल गई है।
फैसले में सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की 2024 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत की कुल प्रजनन दर (TFR), यानी एक महिला के औसतन बच्चों की संख्या, 2003 के 3.0 से घटकर अब 1.9 रह गई है। 2.1 की दर को ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ माना जाता है, यानी वह स्तर जिस पर एक पीढ़ी अपनी जगह अगली पीढ़ी को पूरी तरह भर देती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-6 ने भी 2024 में यह दर करीब 2.0 आंकी है।
कोर्ट ने यह भी लिखा कि जावेद फैसला जिस राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 पर टिका था, उसका लक्ष्य 2010 तक प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट लेवल तक लाना था। वह लक्ष्य न सिर्फ हासिल हो चुका है, बल्कि देश उससे नीचे जा चुका है।

बूढ़ा होता भारत: कोर्ट की असली चेतावनी
फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह चेतावनी है जो कोर्ट ने देश के सामने रखी। बेंच ने माना कि भारत की आबादी अभी घट नहीं रही, लेकिन प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने का मतलब है कि आने वाले सालों में बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और कामकाजी उम्र के लोगों का हिस्सा घटेगा।
कोर्ट के मुताबिक देश में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का हिस्सा 2014 के करीब 8.3% से बढ़कर 2024 में 9.7% हो चुका है, और सरकारी अनुमानों के हिसाब से 2036 तक यह करीब 15% हो जाएगा। जस्टिस नरसिम्हा ने लिखा, “अगर हम ऐसे जनसांख्यिकीय बदलावों पर ध्यान नहीं देंगे, तो भारत को गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव के हिसाब से न ढलना अपने आप में अन्याय है।
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वोट और बच्चे के बीच चुनाव क्यों गलत
बेंच ने सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं की। फैसले में कहा गया है कि ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर कर देते हैं, जबकि बच्चों की संख्या का किसी के पद संभालने की काबिलियत से कोई तर्कसंगत रिश्ता नहीं है। कोर्ट के शब्दों में ये कानून लोगों को “बच्चे पैदा करने और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच एक अनुचित चुनाव” करने पर मजबूर करते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन से जुड़े फैसले लेने की आजादी पर चोट है।
कोर्ट ने महिलाओं पर पड़ने वाले असर को भी गंभीरता से उठाया। फैसले में पंचायती राज मंत्रालय की ओर से कराई गई 2009 की एक स्टडी का जिक्र है, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में इस नियम के लागू होने पर थी। स्टडी के मुताबिक पितृसत्तात्मक समाज में यह नियम महिलाओं को सशक्त करने के बजाय उनकी स्थिति कमजोर करता रहा, क्योंकि बच्चों से जुड़े फैसले अक्सर पति लेते हैं और अयोग्यता की सजा महिला को भुगतनी पड़ती है। फैसले में अयोग्यता से बचने के लिए जबरन गर्भपात, गर्भवती पत्नियों को छोड़ देने और पितृत्व से इनकार जैसे दर्ज मामलों का भी उल्लेख है।
बेंच ने यह भी याद दिलाया कि ऐसे कानूनों की शुरुआत के. करुणाकरण समिति की रिपोर्ट से हुई थी, जिसने ‘पंचायत से संसद तक’ दो से ज्यादा बच्चों वालों को चुनाव से रोकने की सिफारिश की थी। कई राज्यों ने इसे पंचायतों पर लागू कर दिया, लेकिन केंद्रीय स्तर पर ऐसा कोई कानून नहीं बना। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह पाबंदी सिर्फ पंचायत स्तर के नेताओं पर थोपना पूर्वाग्रह से भरा है।
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अब आगे क्या होगा
यह फैसला अभी किसी राज्य के कानून को रद्द नहीं करता। दो जजों की बेंच 2003 के जावेद फैसले को खुद पलट नहीं सकती, इसलिए उसने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि मामला मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए, ताकि वह इस पर सुनवाई के लिए उचित बड़ी बेंच गठित करें। जब तक बड़ी बेंच फैसला नहीं देती, राज्यों के मौजूदा नियम कानूनी तौर पर लागू रहेंगे।
लेकिन इस फैसले का असर दूर तक जा सकता है। कई राज्यों में पंचायत और नगर निकाय चुनावों के लिए, और कुछ जगह सरकारी नौकरियों व योजनाओं के लिए भी दो बच्चों की शर्त जुड़ी रही है। अगर बड़ी बेंच इस बेंच की राय से सहमत होती है, तो तीन या ज्यादा बच्चों वाले हजारों लोगों के लिए स्थानीय चुनाव लड़ने का रास्ता खुल सकता है, और राज्यों को अपनी जनसंख्या नीति नए सिरे से देखनी पड़ सकती है।
यह खबर सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध 4 नवंबर 2026 के फैसले (मंगला भीमराव इंगले बनाम अतिरिक्त आयुक्त, अमरावती डिवीजन व अन्य, 2026 INSC 1193) पर आधारित है।






